Thursday, 19 January 2017
Awareness
'🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙏🇮🇳🇮🇳🇮🇳
The Awakening "is the first lesson of the" enemy "Know.
If your movement enemy not be hidden, you can win any battle.
The 'enemy' to use it to put together with the community to think you are misleading yourself.
Movement ever "the enemy" and are against its policies.
Movement 'compromise' never happens.
Our men's "principles '' to protect the lives sacrificed on the 'compromise' was not.
If we their "principles carrier" and "defender" is not, and then we compromise our men's 'worth' not children, but "stupid" is Awladen.
Today democracy "information" is the greatest weapon the "enemy" to be used against Chahia.jankari use at the right time and to use the same "sense" or "sense" is.
"BAMCEF" said the school's why Thaॅts offs were `awareness of the enemy is terrified today.
Communal riots in the country if it is low or closed "BAMCEF" only "The Awakening" is.
Native DNA research brought before the public enemy of the "exposed" and "Jaymulnivasi as" the work of beating the enemy alone 'BAMCEF' is done by.
"BAMCEF" weapons know the words and art of great men he has assumed.
🙏jay Bim🙏
🇮🇳jay Mulnivasi🇮🇳
About Parents a short story.....
गार्डन में लैपटॉप लिए एक लड़के से
बुजुर्ग दम्पति ने कहा-😐
.
"बेटा हमें फेसबुक का अकाउंट बना दो।"
लड़के ने कहा- "लाइये अभी बना देता हूँ, कहिये किस नाम से
बनाऊँ?"😆
.
बुजुर्ग ने कहा- "लड़की के नाम से कोई भी अच्छा सा नाम
रख लो।"😐😄
.
लड़का ने अचम्भे से पूछा- "फेक अकाउंट क्यों ??"😴
.
बुजुर्ग ने कहा- "बेटा, पहले बना तो दो फिर बताता हूँ
क्यों ??"☺
.
बड़ो का मान करना उस लड़के ने सीखा था तो उसने अकाउंट
बना ही दिया।😇
.
अब उसने पूछा- "अंकल जी, प्रोफाइल इमेज क्या रखूँ?"
तो बुजुर्ग ने कहा- "कोई भी हीरोइन जो आजकल के बच्चों
को अच्छी लगती हो।"😐
.
उस लड़के ने गूगल से इमेज सर्च करके डाल दी, फेसबुक अकाउंट
ओपन हो गया।
.
फिर बुजुर्ग ने कहा- "बेटा कुछ अच्छे लोगो को ऐड कर दो।"
लड़के ने कुछ अच्छे लोगो को रिक्वेस्ट सेंड कर दी।
फिर बुजुर्ग ने अपने बेटे का नाम सर्च करवा के रिक्वेस्ट सेंड
करवा दी। .
लड़का जो वो कहते करता गया जब काम पूरा हो गया तो
उसने कहा....
"अंकल जी अब तो आप बता दीजिये आपने ये फेक अकाउंट
क्यों बनवाया?"
बुजुर्ग की आँखे नम हो गयी, उनकी पत्नी की आँखों से तो
आँसू बहने लगे।
उन्होंने कहा- "मेरा एक ही बेटा है और शादी के बाद वो
हमसे अलग रहने लगा। सालो बीत गए वो हमारे पास नहीं
आता। शुरू शुरू में हम उसके पास जाते थे तो वो नाराज हो
जाता था। कहता आपको मेरी पत्नी पसंद नहीं करती। आप
अपने घर में रहिये, हमें चैन से यहाँ रहने दीजिये। कितना अपमान
सहते इसलिए बेटे के यहाँ जाना छोड़ दिया।
एक पोता है और एक प्यारी पोती है, बस उनको देखने का
बड़ा मन करता है। किसी ने कहा कि फेसबुक में लोग अपने
फैमिली की और फंक्शन की इमेज डालते है,
तो सोचा फेसबुक में ही अपने बेटे से जुड़कर उसकी फैमिली के बारे में जान लेंगे 😞
और अपने पोता पोती को भी देख लेंगे, मन को शांति मिल
जाएगी। अब अपने नाम से तो अकाउंट बना नहीं सकते। वो
हमें ऐड करेगा नहीं, इसलिए हमने ये फेक अकाउंट बनवाया।"
बुजुर्ग दंपत्ति के नम आँखों को उनके पत्नी के बहते आँसुओं को
देखकर उस लड़के का दिल भर आया और सोचने लगा कि माँ-
बाप का दिल कितना बड़ा होता है जो औलाद के कृतघ्न होने
के बाद भी उसे प्यार करते हैं और औलाद कितनी जल्दी माँ-
बाप के प्यार और त्याग को भूल जाती है। "😞
बेकार की सायरी तो बहुत शेयर करते हो लेकिन ये लेख जरूर शेयर करे ताकि ऐसा करने वाले कुछ सिख मिले माता पिता क्या होता हे।।।।
बुजुर्ग दम्पति ने कहा-😐
.
"बेटा हमें फेसबुक का अकाउंट बना दो।"
लड़के ने कहा- "लाइये अभी बना देता हूँ, कहिये किस नाम से
बनाऊँ?"😆
.
बुजुर्ग ने कहा- "लड़की के नाम से कोई भी अच्छा सा नाम
रख लो।"😐😄
.
लड़का ने अचम्भे से पूछा- "फेक अकाउंट क्यों ??"😴
.
बुजुर्ग ने कहा- "बेटा, पहले बना तो दो फिर बताता हूँ
क्यों ??"☺
.
बड़ो का मान करना उस लड़के ने सीखा था तो उसने अकाउंट
बना ही दिया।😇
.
अब उसने पूछा- "अंकल जी, प्रोफाइल इमेज क्या रखूँ?"
तो बुजुर्ग ने कहा- "कोई भी हीरोइन जो आजकल के बच्चों
को अच्छी लगती हो।"😐
.
उस लड़के ने गूगल से इमेज सर्च करके डाल दी, फेसबुक अकाउंट
ओपन हो गया।
.
फिर बुजुर्ग ने कहा- "बेटा कुछ अच्छे लोगो को ऐड कर दो।"
लड़के ने कुछ अच्छे लोगो को रिक्वेस्ट सेंड कर दी।
फिर बुजुर्ग ने अपने बेटे का नाम सर्च करवा के रिक्वेस्ट सेंड
करवा दी। .
लड़का जो वो कहते करता गया जब काम पूरा हो गया तो
उसने कहा....
"अंकल जी अब तो आप बता दीजिये आपने ये फेक अकाउंट
क्यों बनवाया?"
बुजुर्ग की आँखे नम हो गयी, उनकी पत्नी की आँखों से तो
आँसू बहने लगे।
उन्होंने कहा- "मेरा एक ही बेटा है और शादी के बाद वो
हमसे अलग रहने लगा। सालो बीत गए वो हमारे पास नहीं
आता। शुरू शुरू में हम उसके पास जाते थे तो वो नाराज हो
जाता था। कहता आपको मेरी पत्नी पसंद नहीं करती। आप
अपने घर में रहिये, हमें चैन से यहाँ रहने दीजिये। कितना अपमान
सहते इसलिए बेटे के यहाँ जाना छोड़ दिया।
एक पोता है और एक प्यारी पोती है, बस उनको देखने का
बड़ा मन करता है। किसी ने कहा कि फेसबुक में लोग अपने
फैमिली की और फंक्शन की इमेज डालते है,
तो सोचा फेसबुक में ही अपने बेटे से जुड़कर उसकी फैमिली के बारे में जान लेंगे 😞
और अपने पोता पोती को भी देख लेंगे, मन को शांति मिल
जाएगी। अब अपने नाम से तो अकाउंट बना नहीं सकते। वो
हमें ऐड करेगा नहीं, इसलिए हमने ये फेक अकाउंट बनवाया।"
बुजुर्ग दंपत्ति के नम आँखों को उनके पत्नी के बहते आँसुओं को
देखकर उस लड़के का दिल भर आया और सोचने लगा कि माँ-
बाप का दिल कितना बड़ा होता है जो औलाद के कृतघ्न होने
के बाद भी उसे प्यार करते हैं और औलाद कितनी जल्दी माँ-
बाप के प्यार और त्याग को भूल जाती है। "😞
बेकार की सायरी तो बहुत शेयर करते हो लेकिन ये लेख जरूर शेयर करे ताकि ऐसा करने वाले कुछ सिख मिले माता पिता क्या होता हे।।।।
Wednesday, 18 January 2017
हम पीछे क्यों है।
एक बार एक कुत्ते और गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी से जल्दी दौडते हुए दो गाँव आगे रखे एक सिंहासन पर बैठेगा...
वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जायेगा, और राज करेगा.
जैसा कि निश्चित हुआ था, दौड शुरू हुई.
कुत्ते को पूरा विश्वास था कि मैं ही जीतूंगा.
क्योंकि ज़ाहिर है इस गधे से तो मैं तेज ही दौडूंगा.
पर अागे किस्मत में क्या लिखा है ... ये कुत्ते को मालूम ही नही था.
शर्त शुरू हुई .
कुत्ता तेजी से दौडने लगा.
पर थोडा ही आगे गया न गया था कि अगली गली के कुत्तों ने उसे लपकना ,नोंचना ,भौंकना शुरू किया.
और ऐसा हर गली, हर चौराहे पर होता रहा..
जैसे तैसे कुत्ता हांफते हांफते सिंहासन के पास पहुंचा..
तो देखता क्या है कि गधा पहले ही से सिंहासन पर विराजमान है.
तो क्या...!
गधा उसके पहले ही वहां पंहुच चुका था... ?
और शर्त जीत कर वह राजा बन चुका था.. !
और ये देखकर
निराश हो चुका कुत्ता बोल पडा..
अगर मेरे ही लोगों ने मुझे आज पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता ...
तात्पर्य ...
१. अपने लोगों को काॅन्फिडेंस में लो.
२. अपनों को आगे बढने का मौका दो, उन्हें मदद करो.
३. नही तो कल बाहरी गधे हम पर राज करने लगेंगे.
४. पक्का विचार और आत्म परीक्षण करो.
⭐जो मित्र आगे रहकर होटल के बिल का पेमेंट करतें हैं, वो उनके पास खूब पैसा है इसलिये नही ... ⭐
⭐बल्कि इसलिये.. कि उन्हें मित्र पैसों से अधिक प्रिय हैं ⭐
⭐ऐसा नही है कि जो हर काम में आगे रहतें हैं वे मूर्ख होते हैं, बल्कि उन्हें अपनी जवाबदारी का एहसास हरदम बना रहता है इसलिये ⭐
⭐जो लडाई हो चुकने पर पहले क्षमा मांग लेतें हैं, वो इसलिये नही, कि वे गलत थे... बल्कि उन्हें अपने लोगों की परवाह होती है इसलिये.⭐
⭐जो तुम्हे मदद करने के लिये आगे आतें हैं वो तुम्हारा उनपर कोई कर्ज बाकी है इसलिये नही... बल्कि वे तुम्हें अपना मानतें हैं इसलिये⭐
⭐जो खूब वाट्स एप पोस्ट भेजते रहतें हैं वो इसलिये नही कि वे निरे फुरसती होतें हैं ...
बल्कि उनमें सतत आपके संपर्क में बनें रहने की इच्छा रहती है ... इसलिये ⭐
( आत्मचिंतन करने योग्य पोस्ट है )
वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जायेगा, और राज करेगा.
जैसा कि निश्चित हुआ था, दौड शुरू हुई.
कुत्ते को पूरा विश्वास था कि मैं ही जीतूंगा.
क्योंकि ज़ाहिर है इस गधे से तो मैं तेज ही दौडूंगा.
पर अागे किस्मत में क्या लिखा है ... ये कुत्ते को मालूम ही नही था.
शर्त शुरू हुई .
कुत्ता तेजी से दौडने लगा.
पर थोडा ही आगे गया न गया था कि अगली गली के कुत्तों ने उसे लपकना ,नोंचना ,भौंकना शुरू किया.
और ऐसा हर गली, हर चौराहे पर होता रहा..
जैसे तैसे कुत्ता हांफते हांफते सिंहासन के पास पहुंचा..
तो देखता क्या है कि गधा पहले ही से सिंहासन पर विराजमान है.
तो क्या...!
गधा उसके पहले ही वहां पंहुच चुका था... ?
और शर्त जीत कर वह राजा बन चुका था.. !
और ये देखकर
निराश हो चुका कुत्ता बोल पडा..
अगर मेरे ही लोगों ने मुझे आज पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता ...
तात्पर्य ...
१. अपने लोगों को काॅन्फिडेंस में लो.
२. अपनों को आगे बढने का मौका दो, उन्हें मदद करो.
३. नही तो कल बाहरी गधे हम पर राज करने लगेंगे.
४. पक्का विचार और आत्म परीक्षण करो.
⭐जो मित्र आगे रहकर होटल के बिल का पेमेंट करतें हैं, वो उनके पास खूब पैसा है इसलिये नही ... ⭐
⭐बल्कि इसलिये.. कि उन्हें मित्र पैसों से अधिक प्रिय हैं ⭐
⭐ऐसा नही है कि जो हर काम में आगे रहतें हैं वे मूर्ख होते हैं, बल्कि उन्हें अपनी जवाबदारी का एहसास हरदम बना रहता है इसलिये ⭐
⭐जो लडाई हो चुकने पर पहले क्षमा मांग लेतें हैं, वो इसलिये नही, कि वे गलत थे... बल्कि उन्हें अपने लोगों की परवाह होती है इसलिये.⭐
⭐जो तुम्हे मदद करने के लिये आगे आतें हैं वो तुम्हारा उनपर कोई कर्ज बाकी है इसलिये नही... बल्कि वे तुम्हें अपना मानतें हैं इसलिये⭐
⭐जो खूब वाट्स एप पोस्ट भेजते रहतें हैं वो इसलिये नही कि वे निरे फुरसती होतें हैं ...
बल्कि उनमें सतत आपके संपर्क में बनें रहने की इच्छा रहती है ... इसलिये ⭐
( आत्मचिंतन करने योग्य पोस्ट है )
Difference between love and like.....
I like you
I love you..
दोनों में क्या अंतर है?
इसका सबसे सुन्दर जवाब गौतम बुद्ध ने दिया है:
अगर तुम 1 फूल को like करते हो तो तुम उसे तोड़कर रखना चाहोगे।
लेकिन अगर उस फूल से love करते हो तो तोड़ने के बजाय तुम रोज उसमे पानी डालोगे ताकि फूल मुरझाने न पाए।
जिसने भी इस रहस्य को समझ लिया समझो उसने पूरी जिंदगी को ही समझ लिया।😊
I love you..
दोनों में क्या अंतर है?
इसका सबसे सुन्दर जवाब गौतम बुद्ध ने दिया है:
अगर तुम 1 फूल को like करते हो तो तुम उसे तोड़कर रखना चाहोगे।
लेकिन अगर उस फूल से love करते हो तो तोड़ने के बजाय तुम रोज उसमे पानी डालोगे ताकि फूल मुरझाने न पाए।
जिसने भी इस रहस्य को समझ लिया समझो उसने पूरी जिंदगी को ही समझ लिया।😊
रोहित वेमुला की याद .......
*अब तू नहीं ... बस तेरी यादे है ... और संघर्ष से भरा हुआ तेरा इतिहास है |*
रोहित,..... जकजोर कर रख दिया है तेरे आखरी शब्दों ने
_“आदमी की कीमत तो बस उसकी फौरी पहचानमें सिमटकर रहगयी है | निकटतम सम्भावना ही पहचान तय करती है एक वोट से एक संख्यासे एक चीज से | आदमी को एक दिमाग की तरह तो देखा ही नहीं गया....”_
*तेरे पत्र की कुछ बातों ने मुझे बहुत रुलाया...*
_" मै बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं पाया ,बचपन में मुझे किसी का प्यार नही मिला । इस क्षण मै आहत नही हूँ ,मै दुखी नही हूँ,मैं बस खाली हूँ " 😭_😭😭
काश तुम्हारे खालीपन को कोई भर पाता, तुम्हें कोई समझ पाता, कोई तुम्हारी भावनाओ को, अंतर्मन को पढ़ पाता ।
*तुम संघर्ष से नहीं टूटे, बस तुम्हारी भावनाओं को ,तुम्हारे संघर्ष को, तुम्हारे अंतर्मन को कोई पढने वाला नही मिला...*
तुम थे तब भी अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे थे और....
*आज भी मोर्चा ले रहा है तू ब्राह्मणी व्यवस्था के खिलाफ;*
और
*देशव्यापी शक्ल ले रहा है तेरा नाम ब्राह्मणवाद से लेकर फ़ासीवाद तक के ख़िलाफ ।*
विचारधारा के युद्ध मे तेरा यह बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा ।
*द्रोणाचार्य के ताबूत की आखिरी कील बनेगी तुम्हारी शहादत |*
कौन कहता है रोहित मर गया?
*रोहित कभी नहीं मरते ... रोहित हंमेशा जिन्दा रहते है संघर्ष के इतिहास के साथ |*
सलाम .. नमन.. वन्दन डॉ रोहित वेमुला
रोहित,..... जकजोर कर रख दिया है तेरे आखरी शब्दों ने
_“आदमी की कीमत तो बस उसकी फौरी पहचानमें सिमटकर रहगयी है | निकटतम सम्भावना ही पहचान तय करती है एक वोट से एक संख्यासे एक चीज से | आदमी को एक दिमाग की तरह तो देखा ही नहीं गया....”_
*तेरे पत्र की कुछ बातों ने मुझे बहुत रुलाया...*
_" मै बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं पाया ,बचपन में मुझे किसी का प्यार नही मिला । इस क्षण मै आहत नही हूँ ,मै दुखी नही हूँ,मैं बस खाली हूँ " 😭_😭😭
काश तुम्हारे खालीपन को कोई भर पाता, तुम्हें कोई समझ पाता, कोई तुम्हारी भावनाओ को, अंतर्मन को पढ़ पाता ।
*तुम संघर्ष से नहीं टूटे, बस तुम्हारी भावनाओं को ,तुम्हारे संघर्ष को, तुम्हारे अंतर्मन को कोई पढने वाला नही मिला...*
तुम थे तब भी अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे थे और....
*आज भी मोर्चा ले रहा है तू ब्राह्मणी व्यवस्था के खिलाफ;*
और
*देशव्यापी शक्ल ले रहा है तेरा नाम ब्राह्मणवाद से लेकर फ़ासीवाद तक के ख़िलाफ ।*
विचारधारा के युद्ध मे तेरा यह बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा ।
*द्रोणाचार्य के ताबूत की आखिरी कील बनेगी तुम्हारी शहादत |*
कौन कहता है रोहित मर गया?
*रोहित कभी नहीं मरते ... रोहित हंमेशा जिन्दा रहते है संघर्ष के इतिहास के साथ |*
सलाम .. नमन.. वन्दन डॉ रोहित वेमुला
मूलनिवासी
*हम डरते नहीं ब्रम्हा,विष्णु और बम् भोलो से।*
*हम डरते है सिर्फ पूना पैक्ट जैसे समझौतों से।*
*सियार,भेड़िये से डर सकती ऐसी भीम की औलाद नहीं।*
*बालि, अशोक,महिषासुर के पुत्रो की मनुवादियों तुम्हे पहचान नहीं।*
*वर्ण व्यवस्था बनाकर तुम किस्मत पर फूल गए।*
*संविधान लिखा हैं तुम्हारे बाप ने क्या तुम उसको भूल गये।*
*याद करो 500 महारो ने कोरेगांव कोहराम मचा डाला।*
*28 हजार पेशवाओ की पेशवाई का इतिहास मिटा डाला।*
*होश में आओ आर्यो वरना पहचान नहीं होगा।*
*मूलनिवासी तो होगा पर मनुवादियों का नामोनिशान नहीं होगा।*
*ऊंच नीच पैदा कर लूट लिया भारत जैसी समता की घाटी को।*
*किस गफलत में छेड़ रहे तुम गौतम की इस माटी को।*
*जहर पिलाकर रामराज्य का शूद्रों के परवानो को।*
*भगवानो का भय दिखलाकर भेज रहे आरएसएस में नादानों को।*
*आरएसएस के खुले प्रशिक्षण मनुवाद और भगवा फहराने को।*
*मिटा देंगे गर आये तुम संविधान मिटाने को।*
*बहुत लूट चुके अब न पूजेंगे हम ब्रम्हा,बिष्णु और महेश।*
*होश में आओ मनुवादियों बरना भभक उठेगा पूरा देश।*
*मूलनिवासी गर खड़ा हो गया तो भारत में त्राहि-त्राहि मच जायेगी।*
*मनुवादियों के घर में फिर महाप्रलय हो जायेगी।*
*क्या होगा अंजाम इसका तुमको अनुमान नहीं होगा।*
*मूलनिवासी तो होगा पर मनुवादियों का नामोनिशान नहीं होगा।*
*तब ॐ ,स्वाहा वाले मंत्रो पर हिम्मत कौन दिखायेगा।*
*इन मंत्रो को पढ़ने क्या ब्रम्हा बाप तुम्हारा आएगा।*
*अब की चिंता मत कर हम खोल बदल देंगे।*
*इन तुम्हारे पाखण्डी भगवानो का कौड़ी में मोल बदल देंगे।*
*अब देर नहीं इस धरती से मनुवादियों का राज ख़त्म हो जाएगा।*
*फिर भारत में फैलेगा बौद्ध धर्म और पंचशील फहराएगा।*
*अब फिर इस धरती पर पैदा मनु जैसा शैतान नहीं होगा।*
*मूलनिवासी तो होगा पर मनुवादियों का नामो निशान नहीं होगा*
Jay Bhim Jay mulnivasi
*हम डरते है सिर्फ पूना पैक्ट जैसे समझौतों से।*
*सियार,भेड़िये से डर सकती ऐसी भीम की औलाद नहीं।*
*बालि, अशोक,महिषासुर के पुत्रो की मनुवादियों तुम्हे पहचान नहीं।*
*वर्ण व्यवस्था बनाकर तुम किस्मत पर फूल गए।*
*संविधान लिखा हैं तुम्हारे बाप ने क्या तुम उसको भूल गये।*
*याद करो 500 महारो ने कोरेगांव कोहराम मचा डाला।*
*28 हजार पेशवाओ की पेशवाई का इतिहास मिटा डाला।*
*होश में आओ आर्यो वरना पहचान नहीं होगा।*
*मूलनिवासी तो होगा पर मनुवादियों का नामोनिशान नहीं होगा।*
*ऊंच नीच पैदा कर लूट लिया भारत जैसी समता की घाटी को।*
*किस गफलत में छेड़ रहे तुम गौतम की इस माटी को।*
*जहर पिलाकर रामराज्य का शूद्रों के परवानो को।*
*भगवानो का भय दिखलाकर भेज रहे आरएसएस में नादानों को।*
*आरएसएस के खुले प्रशिक्षण मनुवाद और भगवा फहराने को।*
*मिटा देंगे गर आये तुम संविधान मिटाने को।*
*बहुत लूट चुके अब न पूजेंगे हम ब्रम्हा,बिष्णु और महेश।*
*होश में आओ मनुवादियों बरना भभक उठेगा पूरा देश।*
*मूलनिवासी गर खड़ा हो गया तो भारत में त्राहि-त्राहि मच जायेगी।*
*मनुवादियों के घर में फिर महाप्रलय हो जायेगी।*
*क्या होगा अंजाम इसका तुमको अनुमान नहीं होगा।*
*मूलनिवासी तो होगा पर मनुवादियों का नामोनिशान नहीं होगा।*
*तब ॐ ,स्वाहा वाले मंत्रो पर हिम्मत कौन दिखायेगा।*
*इन मंत्रो को पढ़ने क्या ब्रम्हा बाप तुम्हारा आएगा।*
*अब की चिंता मत कर हम खोल बदल देंगे।*
*इन तुम्हारे पाखण्डी भगवानो का कौड़ी में मोल बदल देंगे।*
*अब देर नहीं इस धरती से मनुवादियों का राज ख़त्म हो जाएगा।*
*फिर भारत में फैलेगा बौद्ध धर्म और पंचशील फहराएगा।*
*अब फिर इस धरती पर पैदा मनु जैसा शैतान नहीं होगा।*
*मूलनिवासी तो होगा पर मनुवादियों का नामो निशान नहीं होगा*
Jay Bhim Jay mulnivasi
Wednesday, 9 November 2016
Bhim geet
बहुत हो चुकी है बर्बादी l
सोच भुला दो अब मनुवादी ll
मंदिर और शिवालय छोड़ो l
विद्यालय से नाता जोड़ो ll
संविधान को सब अपनाओ l
बाबा की धुनि मे धुनि लाओ ll
बाबा ने उपहार दिये हैं l
जीने के अधिकार दिये हैं ll
नारी को सम्मान दिया है l
भारत को संविधान दिया है ll
भाषण की आजादी दी है ।
आरक्षण व खादी दी है ll
हम बाबा को भूल गये हैं l
अपने मद मे झूल गये हैं ll
भीम मिशन से मुख मोड़े हैं l
बाबा के सपने तोड़े हैं ll
हम कितने खुद कामी निकले l
कितने नमक हरामी निकले ll
बाबा ने थी जॉब दिलायी l
हमने रामायण पढ़वायी ll
अमरनाथ यात्रा कर आये l
घर में वामन खूब जिमाये ll
घूम के आये वैष्णों माता l
घर पर करवाया जगराता ll
हर महीना गंगा पर जाते l
हर पूर्णिमा हवन कराते ll
हाथ कलावा बांधे फिरते l
लंम्बा तिलक लगाके चलते ll
सत्संगों मे लुटने जाते l
मंदिर में हैं धक्के खाते ll
ये अपनों को भूल गये हैं l
खुदगर्जी मे झूल गये हैं ll
पाखंडो से नाता तोड़ो l
बौद्ध धम्म से खुद को जोड़ो ll
बच्चों को अच्छी शिक्षा दो l
उनको बौद्धधम्म दीक्षा दो ll
आधिकारों को लड़ना सीखो l
अब दुश्मन से भिड़ना सीखो ll
शेरों से दुनिया डरती है l
बकरों पर छूरी चलती है ll
अब शेरों साहस दिखा दो l
अपना भी इतिहास बना दो ll
भीम मिशन साकार बना दो l
दिल्ली में सरकार बना दो ll
क्रांतिकारीजय भीम जय भारत
☝🏻मंजिल वही सोच नई✊🏻
सोच भुला दो अब मनुवादी ll
मंदिर और शिवालय छोड़ो l
विद्यालय से नाता जोड़ो ll
संविधान को सब अपनाओ l
बाबा की धुनि मे धुनि लाओ ll
बाबा ने उपहार दिये हैं l
जीने के अधिकार दिये हैं ll
नारी को सम्मान दिया है l
भारत को संविधान दिया है ll
भाषण की आजादी दी है ।
आरक्षण व खादी दी है ll
हम बाबा को भूल गये हैं l
अपने मद मे झूल गये हैं ll
भीम मिशन से मुख मोड़े हैं l
बाबा के सपने तोड़े हैं ll
हम कितने खुद कामी निकले l
कितने नमक हरामी निकले ll
बाबा ने थी जॉब दिलायी l
हमने रामायण पढ़वायी ll
अमरनाथ यात्रा कर आये l
घर में वामन खूब जिमाये ll
घूम के आये वैष्णों माता l
घर पर करवाया जगराता ll
हर महीना गंगा पर जाते l
हर पूर्णिमा हवन कराते ll
हाथ कलावा बांधे फिरते l
लंम्बा तिलक लगाके चलते ll
सत्संगों मे लुटने जाते l
मंदिर में हैं धक्के खाते ll
ये अपनों को भूल गये हैं l
खुदगर्जी मे झूल गये हैं ll
पाखंडो से नाता तोड़ो l
बौद्ध धम्म से खुद को जोड़ो ll
बच्चों को अच्छी शिक्षा दो l
उनको बौद्धधम्म दीक्षा दो ll
आधिकारों को लड़ना सीखो l
अब दुश्मन से भिड़ना सीखो ll
शेरों से दुनिया डरती है l
बकरों पर छूरी चलती है ll
अब शेरों साहस दिखा दो l
अपना भी इतिहास बना दो ll
भीम मिशन साकार बना दो l
दिल्ली में सरकार बना दो ll
क्रांतिकारीजय भीम जय भारत
☝🏻मंजिल वही सोच नई✊🏻
Thursday, 27 October 2016
🌹🌹दिवाली और बुद्धिज़्म🌹🌹
🌹🌹दिवाली और बुद्धिज़्म🌹🌹
भारत के बौद्धों में हर वर्ष दिवाली अर्थात दीपावली को लेकर बड़ा ही संदेह निर्माण हुआ पाया जाता है. कुछ लोग प्रचार कर रहे है कि दिवाली बौद्धों का त्योंहार है. उन्होंने उसे बड़ा ही उमदा सा नाम दिया है -"दीपदानोत्सव".
मेरे अल्प अभ्यास में किसी बौद्ध साहित्य में इस तरह का नाम नहीं मिला. नाही मेरे अल्प अभ्यास से यह साबित हो पाया कि दिवाली यह बौध्दों का त्यौहार है. कुछ लोगों ने जोड़ जाड कर गलत संदर्भो के आधार पर दिवाली को बौद्धों पर थोपने का प्रयास किया है. मैंने जो अभ्यास किया उससे इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि बौद्धों ने दिवाली किसी भी स्वरुप में नहीं मनानी चाहिए.
......... नीचे दिये विवरण से स्पष्ट होगा कि दिवाली का दावा पुर्णतः गलत और बेबुनियाद है -
(१) यदि दीपदानोत्सव का त्यौहार अशोक ने शुरू किया होता या बौद्ध परम्पराओं में अस्तित्व में होता तो वह भारत के बाहर बौद्ध देशों में जैसे श्रीलंका, चाइना, जापान, इंडोनेशिया आदि में आज भी पाया जाता, लेकिन ऐसा नहीं है. (परन्तु थाईलैंड में ब्राहमणों की घुसपैठ के कारण वहां कुछ गिने चुने विहारों में ही गणपति और लक्ष्मी की मूर्ति भी बनाई गयी है और दिवाली भी मनाई जाने लगी है). .............. विशेष यह है कि उन देशों ने अशोक जयंती और सभी पूर्णिमा उत्सव मनाये जाने की सत्यता के साथ ही ऐसे किसी उत्सव को मनाये जाने को नकारा है. तथपि विजयादशमी और सारी पोर्णिमाये, अमावस्यये, अष्टमी, चतुर्थी सारे बौद्ध देशों में मनाए जाते है. और इन सारे तिथियों पर बड़ी संख्या में दिप जलाये जाते है. भारत के तिब्बतन बौद्ध विहारों में यह देखने को मिलेगा. अचरज तो तब होता है कि अशोक ने बौद्ध धर्म की सारी घटनाओं की तिथिओं का उल्लेख किया है लेकिन जिसने ८४००० हजार स्तूप सारी दुनिया में बनवाये, उसने उनपर दिए जलाने का आदेश भी दिया, वह अशोक उस दिन की तिथि का उल्लेख करना कैसे भूल गया. ऐसा हो ही नहीं सकता. ८४००० स्तूपों का निर्माण अशोक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सपना या उद्देश था. अगर उसने वहां पर किसी विशिष्ट दिन दिए जलाने का आदेश दिया होता तो उसने उसका उल्लेख किसी ना किसी शिलालेख में अवश्य करवाया होता. जैसे की सातवे स्तंभ के शिलालेख पर हर पोर्णिमा, अमावस्या को पवित्र मानने के आदेश का उल्लेख है. पाकिस्तान में स्थित शाहबाज गढ़ी के स्तूप के शिलालेख पर धम्मविजय दिवस का उल्लेख है.
(२) दिपदानोत्सव के विषय पर जिन्होंने किताब लिखी है उन लेखकों से मैंने खुद बात करके अश्विन या कार्तिक अमावस्या को उत्सव मनाये जाने के सबूत माँगे, तब उनहोंने स्वीकार किया कि कही पर भी ऐसा उल्लेख नहीं है.
(३) मेरे पास अशोकवदान के दो संस्करण है, लेकिन उसमे भी कही पर भी अशोक ने अश्विन अथवा कार्तिक अमावस्या को ऐसे किसी उत्सव को मनाने की बात अंकित नहीं है ................. और यह सब जानते है कि अशोक ने अपने हर आदेश को शिलालेखों ने स्वरुप में लिख रखा है. ........... तब उसने इतने महत्वपूर्ण उत्सव की बात कैसे छोड़ दी.
(४) कई लोगों ने भावनावश दिवाली के मजबूत समर्थन में वाराणसी के एक बौद्ध विद्वान की पोस्ट सब जगह फॉरवर्ड की है. ......... लेकिन सच तो यह है कि ऐसे डिग्रीहोल्डर लोग समाज को गुमराह करने के लिए अपनी प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करते है. ............. वाराणसी के विद्वान द्वारा दिए गए सभी उद्धरण झूठ और गलत है, केवल एक ही सच के कि, सम्राट अशोक ने ८४००० स्तूप बनवाये थे और वहाँ दीप प्रज्वलित करने का आदेश दिया था. उनके पोस्ट में वर्णित झूठ इस प्रकार है -
- राजा हर्षवर्धन लिखित 'नागानन्द' में कही पर भी दिपदानोत्सव आश्विन या कार्तिक अमावस्या को ऐसे किसी उत्सव को मनाये जाना का लिखा नहीं है.
- दीपवंश, महावंश में भी कही पर भी अश्विन या कार्तिक अमावस्या को दीपदानोत्सव (दिवाली) मनाये जाने का उल्लेख नहीं है.
- साथ ही उनके द्वारा वर्णित यह भी झूठ है कि भगवान् बुद्ध बुद्धत्व प्राप्ति के बाद पहली बार जब कपिलवस्तु आये थे वह दिन अश्विन अमावस्या का था ......... जब कि सामान्य से सामान्य बौद्ध उपासक भी जानता है कि भगवान् बुद्ध 'फाल्गुन पूर्णिमा' (होली वाला दिन) को पहली बार कपिलवस्तु आये थे.
(५) अतएव, ....... मै अपने सर्वप्रथम विचार का पुनः उल्लेख करना चाहूँगा कि अगर आप दीपदानोत्सव मनाना चाहते हो, तो जैसे कि इन सभी लेखकों ने स्पष्टरूप से लिखा है की अशोक ने स्तूपों पर दीप प्रज्वलित करने का आदेश दिया था (जिस तथ्य को मै भी स्वीकार करता हूँ) ............ उस तथ्य को मान कर हम लोगों ने अपने शहर गाँव के समीप के बुद्ध स्तूप, शिलालेख, अशोक कालीन प्राचीन विहार, अशोक स्तंभ या बौद्ध लेणी (बौद्ध गुफा) पर अश्विन अथवा कार्तिक अमावस्या को ५ दिन जाकर बुद्ध वंदना के साथ दीपप्रज्वलित या दीप-अर्पित करने चाहिए ........... (अपनी बस्ती या घर या बस्ती के विहार में दीपदानोत्सव ना करे). कूछ लोगों ने अपनी बस्ती में दिए हाथ में लेकर जुलुस निकालना निकालना चालू किया है.
(६) दिवाली के दिन पंचशील ध्वज और दिए हाथ में लेकर जुलुस निकालने की प्रक्रिया बड़ी ही बचकानी प्रतीत होती है. देखने वाले हिन्दू लोग तो इन बौद्धों की इस हरकत पर मन ही मन हँसते होंगे और आपस में ऐसे बौद्धों की खिल्ली उड़ाते होगे. वे अवश्य सोचते होंगे ये दलित लोग या बौद्ध लोग आज तक फटाके फोड़कर दिवाली मनाते थे, लेकिन अब बौद्ध बन जाने के बाद अपने मन के दिवाली मनाने की इच्छा को दबाने के लिए (और साथ में भारत के महत्वपूर्ण त्यौहार का विरोध करने के लिए) ऐसे उटपटांग हाथ में ध्वज और दिए लेकर रास्ते पर चल रहे है.
जुलुस निकालने की इस प्रक्रिया के बारे में विशेष् रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि भले ही बौद्ध लोग जुलुस निकालकर ब्राह्मणी दिवाली का विरोध प्रदर्शन करने का प्रयत्न करते हो, मात्र वास्तव में इस प्रक्रिया द्वारा इस त्यौहार का विरोध ना होकर, दिवाली त्यौहार को समरस बनाने की प्रक्रिया है, जो बेहद घातक ही है. इसे समझना जरूरी है.
(७) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, कोई भी सामाजिक क्रांति प्रस्थापित व्यवस्था को विरोध की भावना या प्रक्रिया के द्वारा ही संपन्न होती है. ......... अर्थात कोई भी परिवर्तन समरसता या मिलावट के विचार या मिलावटी संस्कृति द्वारा संपन्न नहीं होता. .............. इसलिए हमारे लोग यदि दिवाली को किसी अन्य तरीके से मनाने का प्रयास करे तो हिंदुओं द्वारा यह कहा जायेगा कि 'हम लक्ष्मी की पूजा करते है, तो उसके बजाय ये लोग बुद्ध की पूजा करते है'. ................. और इसप्रकार से बाबासाहब को अपेक्षित किसी भी सामाजिक परिवर्तन की कल्पना नहीं की जा सकती. (बाबासाहब भी अगर चाहते तो सावरकर की बात मानकर हिन्दू धर्म में थोड़े बहुत सुधार मानकर हिन्दू धर्म को ही अपनाए रख सकते थे लेकिन उन्होंने हिन्दू धर्म को पूरी तरह से त्यागकर बौद्ध धर्म को अपनाया है).
(८) अभी हम लोगों ने होली के त्यौहार के विरोध में, अपने लोगों द्वारा नजदीकी प्राचीन स्तूप, लेणी, अशोक स्तंभ, शिलालेख, मूर्ति पर जाकर दिनभर धम्म संगोष्टी करना शुरू किया है. क्योंकि बौद्धों ने होली नहीं मनाना है. लेकिन हम अगर अपनी बस्ती या घर में रहे तो कोई ना कोई आकर रंग लगाकर जायेगा ही और इस तरह आप होली खेल ही लोगे. बच्चों को तो रोका ही नहीं जा सकता. वास्तव में होली के दिन फाल्गुन पोर्णिमा होती है. और बौद्ध धम्म की सबसे पवित्र और प्राचीन परंपरा के अनुसार हर पोर्णिमा को नजदीकी बुद्ध स्तूप, लेणी पर जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करना बौद्धों का कर्तव्य है. इसलिए अब बौद्धों ने होली के दिन इस परंपरा को निभाकर होली नहीं खेलने का अपना कर्तव्य पूरा करना शुरू किया है.
(९) दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ हिन्दू कैलेन्डर में दिवाली 'कार्तिक अमावस्या' को दर्शाई जाती है तो कुछ हिन्दू कैलेन्डर में 'अश्विन अमावस्या' को. वास्तव में मध्य और दक्षिणी भारत में 'विक्रम संवत' के हिसाब से कैलेन्डर तयार किये जाते है तो उत्तरी भारत में 'शक संवत' के हिसाब से. इसलिए उत्तरी भारत के कैलेन्डर में दिवाली कार्तिक अमावस्या को दर्शाई जाती है तो दक्षिणी भारत के कैलेन्डर में वह अश्विन अमावस्या को. कुछ भाग में तो पूरा संभ्रम है. इतना ही नहीं तो दिवाली के अंत में एक देव दिवाली भी मनाई जाती है जो उत्तरी भारत के कैलेन्डर में कार्तिक माह के अंत में तो अन्य भाग विशेषत महाराष्ट्र कैलेन्डर में मार्गशीर्ष महीने के प्रतिपदा को मनाई जाती है. इसतरह विक्रम संवत और शक संवत में १३५ साल का अंतर है. शक संवत बौध्द शक राजा कनिष्क ने शुरू किया था तो विक्रम संवत वैदिक राजा विक्रमादित्य ने. इसतरह तिथियों में भी संभ्रम है और राम के वापस आने के दिन में भी. तो फिर कौनसी तिथि को हिन्दू अर्थात ब्राह्मणों के गुलाम पवित्र मानते है, यह वे खुद भी नहीं जानते ?
(१०) जैन धर्म में दिवाली का अलग महत्व है. इस दिन भगवान् महावीर का निर्वाण हुआ था. (इस बात पर ध्यान दें कि महावीर की मृत्यु को मात्र 'निर्वाण' कहा जाता है, जबकि बुद्ध के संबंध में उसे 'महापरिनिर्वाण' से संबोधित किया जाता है. यह एक अलग विषय है). वे इस दिन को पवित्र मानकर दिए जलाते है और अपने व्यवसाय का नया बहीखाता तयार करते है.
(१०) इस बात का मै पूर्ण समर्थन करता हूँ कि बौद्ध अर्थात मूल भारतीय उत्सवों का विकृतिकरण ब्राह्मणों ने किया था, लेकिन इसका यह मतलब नही होता कि उस त्यौहार का विरोध करने के लिए हम कोई विकृत नयी परम्परा शुरू करे. जैसे कि कुछ लोग दिवाली के दिन सफ़ेद कपड़े पहनकर, हाथ में पंचशील ध्वज और दिए लेकर, बुद्धं शरणं का घोष करते हुए रास्तों पर जुलुस निकालते है. कुछ लोग अपने घर के पास के विहार में जाकर वंदना या ध्यान विपस्सना करते है. वे तर्क देते है कि हमारे विहार भी तो लेणी ही है. अब इन्हें कौन समझाए कि भाई आपके पास अपने प्राचीन स्थलों को भेट देने का कोई प्रोग्राम है भी या नहीं. विहार में तो पुरे साल भर जाते ही रहते है. साल में एक या दो बार तो अपने प्राचीन स्थलों पर भी भेंट देना चाहिए या नहीं. वैसे भी "हर रविवार को बुद्ध विहार में जाकर बुद्ध वंदना करने के" बाबासाहब के अंतिम आदेश का पालन भी हमारे लोग कहाँ करते है. मुझे बड़ा ही आश्चर्य होता है बौद्धों के आलस और उदासीनता को देखकर.
खैर, दिवाली का हमें विरोध तो करना है, लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारी क्रिया हास्यापद ना लगे. हमारा सुझाव यह है कि इस दिन या इन दिनों में छुट्टिया होती है. हम लोग इन दिनों में बुद्ध लेणी और स्तूप पर यात्रा का आयोजन करे. वैसे भी हम दिवाली या दीपावली को लेकर सम्राट अशोक और बुद्ध स्तूपों को याद करते है, तो फिर क्यों ना हम प्रतिवर्ष भिन्न भिन्न जगहों पर स्थित बुद्ध स्तूपों और लेणियों को भेंट देकर वहां जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करने की सबसे पवित्र परम्परा का निर्वाह करे. इस तरह हमारे बच्चों को भारत के वैभवशाली बौद्ध इतिहास का परिचय होगा और साथ ही बौद्ध धरोहरों का संगोपन भी. जैनों में जिसतरह से उनके प्राचीन स्थलों पर भेंट और पूजा पाठ का प्रयोजन होता है. उसीतरह से हम लोग भी दिवाली की छुट्टियों का उपयोग अपने प्राचीन बुद्ध स्तूपों को भेंट देने के लिए करे. भारत के हर राज्य में प्राचीन वैभवशाली बौद्ध स्तूप और लेणीयाँ है. इससे बौद्दों का बौद्ध स्थलों पर आवागमन बढेगा और बौद्ध लोगों का उन जगहों पर अस्तित्व भी. आवागमन यह एक आंदोलन (पेंडुलम के क्रियाशील रहने की प्रक्रिया) का भाग है. इस आवागमन के आंदोलन का ही उपयोग हिन्दू और जैन धर्म में बखूभी निभाया जाता है. हमें भी आवागमन के आंदोलन को समझना होगा.
साथ ही पढ़े-
(१) बौद्ध व्यक्ति की परिभाषा
(२) www.ashokajayanti.blogspot.in
(३) www.mahashivratri-buddhist-festival.blogspot.in
नमो बुद्धाय .... जयभीम
भारत के बौद्धों में हर वर्ष दिवाली अर्थात दीपावली को लेकर बड़ा ही संदेह निर्माण हुआ पाया जाता है. कुछ लोग प्रचार कर रहे है कि दिवाली बौद्धों का त्योंहार है. उन्होंने उसे बड़ा ही उमदा सा नाम दिया है -"दीपदानोत्सव".
मेरे अल्प अभ्यास में किसी बौद्ध साहित्य में इस तरह का नाम नहीं मिला. नाही मेरे अल्प अभ्यास से यह साबित हो पाया कि दिवाली यह बौध्दों का त्यौहार है. कुछ लोगों ने जोड़ जाड कर गलत संदर्भो के आधार पर दिवाली को बौद्धों पर थोपने का प्रयास किया है. मैंने जो अभ्यास किया उससे इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि बौद्धों ने दिवाली किसी भी स्वरुप में नहीं मनानी चाहिए.
......... नीचे दिये विवरण से स्पष्ट होगा कि दिवाली का दावा पुर्णतः गलत और बेबुनियाद है -
(१) यदि दीपदानोत्सव का त्यौहार अशोक ने शुरू किया होता या बौद्ध परम्पराओं में अस्तित्व में होता तो वह भारत के बाहर बौद्ध देशों में जैसे श्रीलंका, चाइना, जापान, इंडोनेशिया आदि में आज भी पाया जाता, लेकिन ऐसा नहीं है. (परन्तु थाईलैंड में ब्राहमणों की घुसपैठ के कारण वहां कुछ गिने चुने विहारों में ही गणपति और लक्ष्मी की मूर्ति भी बनाई गयी है और दिवाली भी मनाई जाने लगी है). .............. विशेष यह है कि उन देशों ने अशोक जयंती और सभी पूर्णिमा उत्सव मनाये जाने की सत्यता के साथ ही ऐसे किसी उत्सव को मनाये जाने को नकारा है. तथपि विजयादशमी और सारी पोर्णिमाये, अमावस्यये, अष्टमी, चतुर्थी सारे बौद्ध देशों में मनाए जाते है. और इन सारे तिथियों पर बड़ी संख्या में दिप जलाये जाते है. भारत के तिब्बतन बौद्ध विहारों में यह देखने को मिलेगा. अचरज तो तब होता है कि अशोक ने बौद्ध धर्म की सारी घटनाओं की तिथिओं का उल्लेख किया है लेकिन जिसने ८४००० हजार स्तूप सारी दुनिया में बनवाये, उसने उनपर दिए जलाने का आदेश भी दिया, वह अशोक उस दिन की तिथि का उल्लेख करना कैसे भूल गया. ऐसा हो ही नहीं सकता. ८४००० स्तूपों का निर्माण अशोक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सपना या उद्देश था. अगर उसने वहां पर किसी विशिष्ट दिन दिए जलाने का आदेश दिया होता तो उसने उसका उल्लेख किसी ना किसी शिलालेख में अवश्य करवाया होता. जैसे की सातवे स्तंभ के शिलालेख पर हर पोर्णिमा, अमावस्या को पवित्र मानने के आदेश का उल्लेख है. पाकिस्तान में स्थित शाहबाज गढ़ी के स्तूप के शिलालेख पर धम्मविजय दिवस का उल्लेख है.
(२) दिपदानोत्सव के विषय पर जिन्होंने किताब लिखी है उन लेखकों से मैंने खुद बात करके अश्विन या कार्तिक अमावस्या को उत्सव मनाये जाने के सबूत माँगे, तब उनहोंने स्वीकार किया कि कही पर भी ऐसा उल्लेख नहीं है.
(३) मेरे पास अशोकवदान के दो संस्करण है, लेकिन उसमे भी कही पर भी अशोक ने अश्विन अथवा कार्तिक अमावस्या को ऐसे किसी उत्सव को मनाने की बात अंकित नहीं है ................. और यह सब जानते है कि अशोक ने अपने हर आदेश को शिलालेखों ने स्वरुप में लिख रखा है. ........... तब उसने इतने महत्वपूर्ण उत्सव की बात कैसे छोड़ दी.
(४) कई लोगों ने भावनावश दिवाली के मजबूत समर्थन में वाराणसी के एक बौद्ध विद्वान की पोस्ट सब जगह फॉरवर्ड की है. ......... लेकिन सच तो यह है कि ऐसे डिग्रीहोल्डर लोग समाज को गुमराह करने के लिए अपनी प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करते है. ............. वाराणसी के विद्वान द्वारा दिए गए सभी उद्धरण झूठ और गलत है, केवल एक ही सच के कि, सम्राट अशोक ने ८४००० स्तूप बनवाये थे और वहाँ दीप प्रज्वलित करने का आदेश दिया था. उनके पोस्ट में वर्णित झूठ इस प्रकार है -
- राजा हर्षवर्धन लिखित 'नागानन्द' में कही पर भी दिपदानोत्सव आश्विन या कार्तिक अमावस्या को ऐसे किसी उत्सव को मनाये जाना का लिखा नहीं है.
- दीपवंश, महावंश में भी कही पर भी अश्विन या कार्तिक अमावस्या को दीपदानोत्सव (दिवाली) मनाये जाने का उल्लेख नहीं है.
- साथ ही उनके द्वारा वर्णित यह भी झूठ है कि भगवान् बुद्ध बुद्धत्व प्राप्ति के बाद पहली बार जब कपिलवस्तु आये थे वह दिन अश्विन अमावस्या का था ......... जब कि सामान्य से सामान्य बौद्ध उपासक भी जानता है कि भगवान् बुद्ध 'फाल्गुन पूर्णिमा' (होली वाला दिन) को पहली बार कपिलवस्तु आये थे.
(५) अतएव, ....... मै अपने सर्वप्रथम विचार का पुनः उल्लेख करना चाहूँगा कि अगर आप दीपदानोत्सव मनाना चाहते हो, तो जैसे कि इन सभी लेखकों ने स्पष्टरूप से लिखा है की अशोक ने स्तूपों पर दीप प्रज्वलित करने का आदेश दिया था (जिस तथ्य को मै भी स्वीकार करता हूँ) ............ उस तथ्य को मान कर हम लोगों ने अपने शहर गाँव के समीप के बुद्ध स्तूप, शिलालेख, अशोक कालीन प्राचीन विहार, अशोक स्तंभ या बौद्ध लेणी (बौद्ध गुफा) पर अश्विन अथवा कार्तिक अमावस्या को ५ दिन जाकर बुद्ध वंदना के साथ दीपप्रज्वलित या दीप-अर्पित करने चाहिए ........... (अपनी बस्ती या घर या बस्ती के विहार में दीपदानोत्सव ना करे). कूछ लोगों ने अपनी बस्ती में दिए हाथ में लेकर जुलुस निकालना निकालना चालू किया है.
(६) दिवाली के दिन पंचशील ध्वज और दिए हाथ में लेकर जुलुस निकालने की प्रक्रिया बड़ी ही बचकानी प्रतीत होती है. देखने वाले हिन्दू लोग तो इन बौद्धों की इस हरकत पर मन ही मन हँसते होंगे और आपस में ऐसे बौद्धों की खिल्ली उड़ाते होगे. वे अवश्य सोचते होंगे ये दलित लोग या बौद्ध लोग आज तक फटाके फोड़कर दिवाली मनाते थे, लेकिन अब बौद्ध बन जाने के बाद अपने मन के दिवाली मनाने की इच्छा को दबाने के लिए (और साथ में भारत के महत्वपूर्ण त्यौहार का विरोध करने के लिए) ऐसे उटपटांग हाथ में ध्वज और दिए लेकर रास्ते पर चल रहे है.
जुलुस निकालने की इस प्रक्रिया के बारे में विशेष् रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि भले ही बौद्ध लोग जुलुस निकालकर ब्राह्मणी दिवाली का विरोध प्रदर्शन करने का प्रयत्न करते हो, मात्र वास्तव में इस प्रक्रिया द्वारा इस त्यौहार का विरोध ना होकर, दिवाली त्यौहार को समरस बनाने की प्रक्रिया है, जो बेहद घातक ही है. इसे समझना जरूरी है.
(७) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, कोई भी सामाजिक क्रांति प्रस्थापित व्यवस्था को विरोध की भावना या प्रक्रिया के द्वारा ही संपन्न होती है. ......... अर्थात कोई भी परिवर्तन समरसता या मिलावट के विचार या मिलावटी संस्कृति द्वारा संपन्न नहीं होता. .............. इसलिए हमारे लोग यदि दिवाली को किसी अन्य तरीके से मनाने का प्रयास करे तो हिंदुओं द्वारा यह कहा जायेगा कि 'हम लक्ष्मी की पूजा करते है, तो उसके बजाय ये लोग बुद्ध की पूजा करते है'. ................. और इसप्रकार से बाबासाहब को अपेक्षित किसी भी सामाजिक परिवर्तन की कल्पना नहीं की जा सकती. (बाबासाहब भी अगर चाहते तो सावरकर की बात मानकर हिन्दू धर्म में थोड़े बहुत सुधार मानकर हिन्दू धर्म को ही अपनाए रख सकते थे लेकिन उन्होंने हिन्दू धर्म को पूरी तरह से त्यागकर बौद्ध धर्म को अपनाया है).
(८) अभी हम लोगों ने होली के त्यौहार के विरोध में, अपने लोगों द्वारा नजदीकी प्राचीन स्तूप, लेणी, अशोक स्तंभ, शिलालेख, मूर्ति पर जाकर दिनभर धम्म संगोष्टी करना शुरू किया है. क्योंकि बौद्धों ने होली नहीं मनाना है. लेकिन हम अगर अपनी बस्ती या घर में रहे तो कोई ना कोई आकर रंग लगाकर जायेगा ही और इस तरह आप होली खेल ही लोगे. बच्चों को तो रोका ही नहीं जा सकता. वास्तव में होली के दिन फाल्गुन पोर्णिमा होती है. और बौद्ध धम्म की सबसे पवित्र और प्राचीन परंपरा के अनुसार हर पोर्णिमा को नजदीकी बुद्ध स्तूप, लेणी पर जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करना बौद्धों का कर्तव्य है. इसलिए अब बौद्धों ने होली के दिन इस परंपरा को निभाकर होली नहीं खेलने का अपना कर्तव्य पूरा करना शुरू किया है.
(९) दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ हिन्दू कैलेन्डर में दिवाली 'कार्तिक अमावस्या' को दर्शाई जाती है तो कुछ हिन्दू कैलेन्डर में 'अश्विन अमावस्या' को. वास्तव में मध्य और दक्षिणी भारत में 'विक्रम संवत' के हिसाब से कैलेन्डर तयार किये जाते है तो उत्तरी भारत में 'शक संवत' के हिसाब से. इसलिए उत्तरी भारत के कैलेन्डर में दिवाली कार्तिक अमावस्या को दर्शाई जाती है तो दक्षिणी भारत के कैलेन्डर में वह अश्विन अमावस्या को. कुछ भाग में तो पूरा संभ्रम है. इतना ही नहीं तो दिवाली के अंत में एक देव दिवाली भी मनाई जाती है जो उत्तरी भारत के कैलेन्डर में कार्तिक माह के अंत में तो अन्य भाग विशेषत महाराष्ट्र कैलेन्डर में मार्गशीर्ष महीने के प्रतिपदा को मनाई जाती है. इसतरह विक्रम संवत और शक संवत में १३५ साल का अंतर है. शक संवत बौध्द शक राजा कनिष्क ने शुरू किया था तो विक्रम संवत वैदिक राजा विक्रमादित्य ने. इसतरह तिथियों में भी संभ्रम है और राम के वापस आने के दिन में भी. तो फिर कौनसी तिथि को हिन्दू अर्थात ब्राह्मणों के गुलाम पवित्र मानते है, यह वे खुद भी नहीं जानते ?
(१०) जैन धर्म में दिवाली का अलग महत्व है. इस दिन भगवान् महावीर का निर्वाण हुआ था. (इस बात पर ध्यान दें कि महावीर की मृत्यु को मात्र 'निर्वाण' कहा जाता है, जबकि बुद्ध के संबंध में उसे 'महापरिनिर्वाण' से संबोधित किया जाता है. यह एक अलग विषय है). वे इस दिन को पवित्र मानकर दिए जलाते है और अपने व्यवसाय का नया बहीखाता तयार करते है.
(१०) इस बात का मै पूर्ण समर्थन करता हूँ कि बौद्ध अर्थात मूल भारतीय उत्सवों का विकृतिकरण ब्राह्मणों ने किया था, लेकिन इसका यह मतलब नही होता कि उस त्यौहार का विरोध करने के लिए हम कोई विकृत नयी परम्परा शुरू करे. जैसे कि कुछ लोग दिवाली के दिन सफ़ेद कपड़े पहनकर, हाथ में पंचशील ध्वज और दिए लेकर, बुद्धं शरणं का घोष करते हुए रास्तों पर जुलुस निकालते है. कुछ लोग अपने घर के पास के विहार में जाकर वंदना या ध्यान विपस्सना करते है. वे तर्क देते है कि हमारे विहार भी तो लेणी ही है. अब इन्हें कौन समझाए कि भाई आपके पास अपने प्राचीन स्थलों को भेट देने का कोई प्रोग्राम है भी या नहीं. विहार में तो पुरे साल भर जाते ही रहते है. साल में एक या दो बार तो अपने प्राचीन स्थलों पर भी भेंट देना चाहिए या नहीं. वैसे भी "हर रविवार को बुद्ध विहार में जाकर बुद्ध वंदना करने के" बाबासाहब के अंतिम आदेश का पालन भी हमारे लोग कहाँ करते है. मुझे बड़ा ही आश्चर्य होता है बौद्धों के आलस और उदासीनता को देखकर.
खैर, दिवाली का हमें विरोध तो करना है, लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारी क्रिया हास्यापद ना लगे. हमारा सुझाव यह है कि इस दिन या इन दिनों में छुट्टिया होती है. हम लोग इन दिनों में बुद्ध लेणी और स्तूप पर यात्रा का आयोजन करे. वैसे भी हम दिवाली या दीपावली को लेकर सम्राट अशोक और बुद्ध स्तूपों को याद करते है, तो फिर क्यों ना हम प्रतिवर्ष भिन्न भिन्न जगहों पर स्थित बुद्ध स्तूपों और लेणियों को भेंट देकर वहां जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करने की सबसे पवित्र परम्परा का निर्वाह करे. इस तरह हमारे बच्चों को भारत के वैभवशाली बौद्ध इतिहास का परिचय होगा और साथ ही बौद्ध धरोहरों का संगोपन भी. जैनों में जिसतरह से उनके प्राचीन स्थलों पर भेंट और पूजा पाठ का प्रयोजन होता है. उसीतरह से हम लोग भी दिवाली की छुट्टियों का उपयोग अपने प्राचीन बुद्ध स्तूपों को भेंट देने के लिए करे. भारत के हर राज्य में प्राचीन वैभवशाली बौद्ध स्तूप और लेणीयाँ है. इससे बौद्दों का बौद्ध स्थलों पर आवागमन बढेगा और बौद्ध लोगों का उन जगहों पर अस्तित्व भी. आवागमन यह एक आंदोलन (पेंडुलम के क्रियाशील रहने की प्रक्रिया) का भाग है. इस आवागमन के आंदोलन का ही उपयोग हिन्दू और जैन धर्म में बखूभी निभाया जाता है. हमें भी आवागमन के आंदोलन को समझना होगा.
साथ ही पढ़े-
(१) बौद्ध व्यक्ति की परिभाषा
(२) www.ashokajayanti.blogspot.in
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