Saturday, 12 January 2019

वैचारिक आंदोलन

_*🙏🧠🙏वैचारिक आंदोलन🙏🧠🙏*_

_लेख बहुत महत्वपूर्ण है,इसीलिए जरूर पढ़िएगा_

*👉समस्त झगड़ों की जड़ है= ब्राह्मण👈*

*"जानिए ब्राह्मण के चाल, चरित्र और चेहरे को"*

01. अपने पक्ष में *वेद* लिखने वाले = *ब्राह्मण*
02. धर्म के भ्रमजाल पर *पुराण* लिखने वाले = *ब्राह्मण*
03. धर्म के विस्तार के लिए *उपनिषद* लिखने वाले = *ब्राह्मण*
04. आपसी झगड़ों पर *ग्रंथ* लिखने वाले = *ब्राह्मण*
05. खुद की श्रेष्ठता के लिए *मनुस्मृति* लिखने वाला = *ब्राह्मण*
06. अंधविश्वास में फंसाने के लिए *पंचांग* लिखने वाला = *ब्राह्मण*
07. अपने रोजगार के लिए *मंदिर* बनवाने वाला = *ब्राह्मण*
08. काल्पनिक *भगवान* बनाने वाला = *ब्राह्मण*
09. मिथ्या *पूजापाठ* कराने वाला = *ब्राह्मण*
10. मूर्ख बनाने के लिए *कर्मकांड* करने वाला = *ब्राह्मण*
11. गरीबों में *पाखंड* फैलाने वाला = *ब्राह्मण*
12. अशिक्षितों में *अंधविश्वास* फैलाने वाला = *ब्राह्मण*
13. चमत्कार के नाम पर *ढोंग* फैलाने वाला = *ब्राह्मण*
14. अपनी जाति से दूसरी जातियों को *छोटी* बनाने वाला = *ब्राह्मण*
15. जातियों में *ऊँच-नीच* की भावना फैलाने वाला = *ब्राह्मण*
16. जातियों के *टुकड़ें* करने वाला = *ब्राह्मण*
17. जातियों को काम *बांटने* वाला = *ब्राह्मण*
18. जाति के आधार पर *भेदभाव-छुआछूत* करवाने वाला = *ब्राह्मण*
19. इंसानों को *अछूत* बनाने वाला = *ब्राह्मण*
20. छोटी जातियों पर *अत्याचार* कराने वाला = *ब्राह्मण*
21. जाति देखकर *सजा* देने वाला = *ब्राह्मण*
22. शूद्रों को *नीच* बताने वाला = *ब्राह्मण*
23. महिलाओं को *उपभोग की वस्तु* बताने वाला = *ब्राह्मण*
24. *महिलाओं* को बराबर नहीं मानने वाला = *ब्राह्मण*
25. *कांग्रेस* को बनाने वाले = *ब्राह्मण*
26. *आरएसएस* को बनाने वाले = *ब्राह्मण*
27. *जनसंघ* को बनाने वाले = *ब्राह्मण*
28. *जनता पार्टी* को बनाने वाले = *ब्राह्मण*
29. *भाजपा* को बनाने वाले = *ब्राह्मण*
30. *माकपा-भाकपा-तृणमूल कांग्रेस* को बनाने वाले = *ब्राह्मण*
31. सबसे ज्यादा *प्रधानमंत्री* बनने वाले = *ब्राह्मण*
32. सबसे ज्यादा *राष्ट्रपति* बनने वाले = *ब्राह्मण*
33. सबसे ज्यादा *एमपी-एमएलए* बनने वाले = *ब्राह्मण*
34. सबसे ज्यादा *राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री बनने* वाले = *ब्राह्मण*
35. सबसे ज्यादा *जज* बनने वाले = *ब्राह्मण*
36. सबसे ज्यादा *एसपी-कलेक्टर* बनाने वाले = *ब्राह्मण*
37. *एससी-एसटी* से नफरत करने वाले = *ब्राह्मण*
38. *मुसलमानों* से नफरत करने वाले = *ब्राह्मण*
39. *हिंदू-मुसलमानों* को लड़वाने वाले = ब्राह्मण
40. *आरक्षण* का विरोध करने वाले = *ब्राह्मण*
41. *पदोन्नति में आरक्षण* का विरोध करने वाले = *ब्राह्मण*
42. *एससी-एसटी कानून* का विरोध करने वाले = *ब्राह्मण*
43. *टीवी न्यूज चैनल* चलाने वाले = *ब्राह्मण*
44. *अखबार* छापने वाले = *ब्राह्मण*
45. सबसे ज्यादा *संवाददाता-पत्रकार* बनने वाले = *ब्राह्मण*
46. सबसे बड़े *गायों के कत्लखानें* चलाने वाले = *ब्राह्मण*
47. *सुअरों के कत्लखानें* चलाने वाले = *ब्राह्मण*
48. सबसे ज्यादा *गाय का मीट* खाने वाले = *ब्राह्मण*
49. सबसे ज्यादा *बलात्कार* करने वाले = *ब्राह्मण*
50. सबसे ज्यादा *भ्रष्टाचार* फैलाने वाले = *ब्राह्मण*
51. विदेशों में सबसे ज्यादा *कालाधन* जमा करने वाले = *ब्राह्मण*
52. *ज्योतिबा फुले* को शूद्र कहकर अपमानित करने वाले = *ब्राह्मण*
53. *सावित्रीबाई फुले* पर कीचड़ फेंकने वाले = *ब्राह्मण*
54. बड़ौदा दरबार में *डॉ अंबेडकर* को पानी नहीं पिलाने वाला = *ब्राह्मण*
55. महाड़ तालाब के पानी को छूने पर *बाबा साहब पर हमला* करने वाले : *ब्राह्मण*
56. कालामंदिर में घुसने पर *बाबा साहब पर हमला* करने वाले = *ब्राह्मण*
57. *बाबा साहब की मूर्तियों* को तोड़ने वाले = *ब्राह्मण*
58. अजमेर-मालेगांव(मुम्बई) में *विस्फोट* करने वाले = *ब्राह्मण*
59. *हिंदू आतंकवाद* फैलाने वाले = *ब्राह्मण*
60. *संविधान का विरोध* करने वाले = *ब्राह्मण*
61. पूरे देश में 11.12.1949 को *डॉ अंबेडकर के पुतलें* जलाने वाले = *ब्राह्मण*
62. दिल्ली में 09.08.2018 को *संविधान जलाने* वाले = *ब्राह्मण*
63. *एकलव्य का अंगूठा कटवाने* वाला = *ब्राह्मण*
64. *शंभूक ऋषि की हत्या* कराने वाला = *ब्राह्मण*
65. *बौद्ध राजा बृदहस्त की हत्या* करने वाला = *ब्राह्मण*
66. *महात्मा गांधी की हत्या* करने वाला = *ब्राह्मण*
67. *पत्रकार गौरी लंकेश* की हत्या करने वाले = ब्राह्मण
68. *डाभोलकर की हत्या* करने वाले = *ब्राह्मण*
69. *रोहित वेमुला की हत्या* करने वाले = *ब्राह्मण*
70. *डॉ अंबेडकर की हत्या* करने वाली = *ब्राह्मण*
71. धर्म के नाम पर *लूटने* वाले = *ब्राह्मण*
72. मंदिरों में सबसे ज्यादा *कालाधन* एकत्रित करने वाले = *ब्राह्मण*
73. भगवान के *भय* से डराने वाले = *ब्राह्मण*
74. भगवान के नाम पर *दान* मांगने वाले = *ब्राह्मण*
75. मंदिर के नाम पर *अनुदान* मांगने वाले = *ब्राह्मण*
76. सांसद, विधायक, मेयर, पार्षद, प्रधान, सरपंच बनने के लिए सबसे ज्यादा *मतदान मांगने* वाले = *ब्राह्मण*

*यह है ब्राह्मणों का काला इतिहास। अर्थात एक बार सांप पर विश्वास कर लेना, परंतु किसी भी हालत में ब्राह्मणों पर विश्वास मत करना....*

*ब्राह्मण* भारत की कुल जनसंख्या के *मात्र 3.5%* हैं, परंतु ब्राह्मण का भारत की कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक आदि की *80% व्यवस्था* पर कब्जा है....

*कुल मिलाकर समस्त झगड़ों की जड़ है = ब्राह्मण*
*समस्त जातियों के पिछड़ेपन की जड़ है = ब्राह्मण*

इसीलिए जनता को अपने हक और अधिकारों के लिए जागरूक होना बहुत जरूरी है, अन्यथा भारत की गैरब्राह्मण जनसंख्या यानि भारत के मूलनिवासी कभी भी विकास नहीं कर पाएंगे।

_*इसीलिए ब्राह्मण को ब्राह्मण के द्वारा रचित धार्मिक व्यवस्था के जातीय मकड़जाल में फंसाना बहुत जरूरी है....*_

*1. ब्राह्मण* को सिर्फ पूजापाठ, कर्मकांड, हवन, यज्ञ आदि करने चाहिए, इसके अलावा कुछ नहीं....
*2. क्षत्रिय* को सिर्फ देश की सुरक्षा करनी चाहिए, इसके अलावा कुछ नहीं....
*3. वैश्यों* को सिर्फ व्यापार करना चाहिए, इसके अलावा कुछ नहीं....

और

*4. शूद्रों* को राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक के पदों पर चयनित होकर सिर्फ देश की सेवा करनी चाहिए, इसक अलावा कुछ नहीं....

आइए, देश के शासन-प्रशासन से ब्राह्मणों के 80% अनावश्यक कब्जे को खाली करवाते हैं....

_*हमें चाहिए आजादी।*_
_*ब्राह्मणवाद से आजादी।।*_

_*मताधिकार हमारा संवैधानिक अधिकार है जो ब्राह्मणवादी अत्याचारों से लड़ने का सबसे कारगर और जबरदस्त हथियार है जिसका प्रयोग करके हम अपनी संवैधानिक आजादी प्राप्त कर सकते हैं....*_

नजरिया: आरक्षित सीटों से आने वाले नेता निकम्मे साबित होते है।

*नज़रिया: ‘आरक्षित सीटों से आने वाले नेता निकम्मे साबित हुए हैं’*

*Part-1*

*संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की वजह से चुनकर आने वाले लगभग बारह सौ जनप्रतिनिधियों ने* अपने समुदाय को लगातार निराश किया है. दलित और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि बेहद निकम्मे साबित हुए हैं.

लेकिन इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं है उनका ऐसा करना एक संरचनात्मक मजबूरी है *क्योंकि उनका चुना जाना उनके अपने समुदाय के वोटों पर निर्भर ही नहीं है.*

मिसाल के तौर पर *जिग्नेश मेवानी वडगाम सीट पर 15 प्रतिशत दलित वोटर की वजह से नहीं, 85 प्रतिशत ग़ैर-दलित वोटरों के समर्थन से चुने गए हैं.*

*उस सीट के सारे दलित मिलकर भी कभी किसी को जिता नहीं सकते.*

*सुरक्षित सीटों पर कोई भी ऐसा जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं आ सकता,* जो दलित या आदिवासी हितों के लिए आक्रामक तरीके से संघर्ष करता हो, और ऐसा करने के क्रम में अन्य समुदायों को नाराज़ करता हो. *रिज़र्व सीटें हमेशा दुर्बल जनप्रतिनिधि ही पैदा कर सकती हैं.*

*संसद और विधानसभा में सीटों के रिज़र्वेशन की व्यवस्था पर सवाल उठाने का समय आ गया है.*

बेहतर होगा कि ये *सवाल ख़ुद अनुसूचित जाति और जनजाति के अंदर से आएं.* इस सवाल पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए.

*समुदाय के लिए करते क्या हैं?*

2009 में भारतीय संसद ने हर दस साल पर होने वाली एक औपचारिकता फिर निभाई. *वही औपचारिकता, अगर कोई ग़ज़ब न हुआ तो, 2019 में फिर निभाई जाएगी.*

*हर दस साल पर, संसद एक संविधान संशोधन विधेयक पारित करती है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसुचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और फिर राष्ट्रपति इस विधेयक को अनुमोदित करते हैं. संविधान का अनुच्छेद 334, हर दस साल पर दस और साल जुड़कर बदल जाता है.*

*इसी प्रावधान की वजह से लोकसभा की 543 में से 79 सीटें अनुसूचित जाति और 41 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व हो जाती हैं. वहीं, विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं.*

*इन सीटों पर वोट तो सभी डालते हैं, लेकिन कैंडिडेट सिर्फ एससी या एसटी का होता है.*

लोकसभा और विधानसभाओं में *आज़ादी के समय से ही* अनुसूचित जाति और जनजाति का उनकी *आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहा है.*

*सवाल यह उठता है कि इतने सारे दलित और आदिवासी सांसद और विधायक अपने समुदाय के लिए करते क्या हैं?*

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के इस साल जारी आंकड़ों के मुताबिक *इन समुदायों के उत्पीड़न के साल में 40,000 से ज़्यादा मुकदमे दर्ज हुए.* यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है. जाहिर है कि *इन आंकड़ों के पीछे एक और आंकड़ा उन मामलों का होगा, जो कभी दर्ज ही नहीं होते हैं.*

*क्या दलित उत्पीड़न की इन घटनाओं के ख़िलाफ़ दलित सांसदों या विधायकों ने कोई बड़ा, याद रहने वाला आंदोलन किया है?*

*ऐसे सवालों पर, संसद कितने बार ठप की गई है और ऐसा रिज़र्व कैटेगरी के सांसदों ने कितनी बार किया है?*

हमने देखा है कि तेलंगाना से आने वाले *दसेक सांसदों ने कई हफ़्ते तक संसद की गतिविधियों को बाधित रखा.*

*कोई वजह नहीं है कि लगभग सवा सौ एससी और एसटी सांसद अगर चाह लें तो संसद में इससे कई गुना ज़्यादा असर पैदा कर सकते हैं.* लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं है.

इसी तरह, *सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जाति और जनजाति को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है*

लेकिन *केंद्र और राज्य सरकारें अक्सर यह सूचना देती हैं कि इन जगहों पर कोटा पूरा नहीं हो रहा है.*

*ख़ासतौर पर उच्च पदों पर, अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे का हाल बेहद बुरा है.* जैसे कि हम देख सकते हैं कि *देश की 43 सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक भी वाइस चांसलर अनुसूचित जाति का नहीं है या कि केंद्र सरकार में सेक्रेटरी स्तर के पदों पर अक्सर एससी या एसटी का कोई अफसर नहीं होता.*

*शासन के उच्च स्तरों पर अनुसूचित जाति और जनजाति की अनुपस्थिति क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों के लिए चिंता का विषय है?* अगर वे इसके लिए चिंतित हैं, तो उन्होंने सरकार पर कितना दबाव बनाया है? *क्या इस सवाल पर कभी संसद के अंदर कोई बड़ा आंदोलन या हंगामा हुआ?* ज़ाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.

चूंकि सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घट रही है और हाल के वर्षों में *निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठी है,*

*लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों और विधायकों के लिए यह कोई मुद्दा है?*

इसी तरह की एक मांग *उच्च न्यायपालिका में आरक्षण की भी है. ख़ासकर संसद की कड़िया मुंडा कमेटी की रिपोर्ट में न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व की बात आने के बाद से यह मांग मज़बूत हुई है. लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों ने कभी इस मुद्दे पर संसद में पुरज़ोर तरीक़े से मांग उठाई है?*

*120 से ज़्यादा एससी और एसटी सांसदों के लिए किसी मुद्दे पर संसद में हंगामा करना और दबाव पैदा करना मुश्किल नहीं है. इन सांसदों का एक ग्रुप भी है और जो अक्सर मिलते भी हैं लेकिन देश ने कभी इन सांसदों को अपने समुदायों के ज़रूरी मुद्दों पर आंदोलन छेड़ते नहीं देखा है.*

नजरिया: आरक्षित सीटों से आने वाले नेता निकम्मे साबित होते है।

*नज़रिया: ‘आरक्षित सीटों से आने वाले नेता निकम्मे साबित हुए हैं’*

*Part-1*

*संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की वजह से चुनकर आने वाले लगभग बारह सौ जनप्रतिनिधियों ने* अपने समुदाय को लगातार निराश किया है. दलित और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि बेहद निकम्मे साबित हुए हैं.

लेकिन इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं है उनका ऐसा करना एक संरचनात्मक मजबूरी है *क्योंकि उनका चुना जाना उनके अपने समुदाय के वोटों पर निर्भर ही नहीं है.*

मिसाल के तौर पर *जिग्नेश मेवानी वडगाम सीट पर 15 प्रतिशत दलित वोटर की वजह से नहीं, 85 प्रतिशत ग़ैर-दलित वोटरों के समर्थन से चुने गए हैं.*

*उस सीट के सारे दलित मिलकर भी कभी किसी को जिता नहीं सकते.*

*सुरक्षित सीटों पर कोई भी ऐसा जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं आ सकता,* जो दलित या आदिवासी हितों के लिए आक्रामक तरीके से संघर्ष करता हो, और ऐसा करने के क्रम में अन्य समुदायों को नाराज़ करता हो. *रिज़र्व सीटें हमेशा दुर्बल जनप्रतिनिधि ही पैदा कर सकती हैं.*

*संसद और विधानसभा में सीटों के रिज़र्वेशन की व्यवस्था पर सवाल उठाने का समय आ गया है.*

बेहतर होगा कि ये *सवाल ख़ुद अनुसूचित जाति और जनजाति के अंदर से आएं.* इस सवाल पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए.

*समुदाय के लिए करते क्या हैं?*

2009 में भारतीय संसद ने हर दस साल पर होने वाली एक औपचारिकता फिर निभाई. *वही औपचारिकता, अगर कोई ग़ज़ब न हुआ तो, 2019 में फिर निभाई जाएगी.*

*हर दस साल पर, संसद एक संविधान संशोधन विधेयक पारित करती है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसुचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और फिर राष्ट्रपति इस विधेयक को अनुमोदित करते हैं. संविधान का अनुच्छेद 334, हर दस साल पर दस और साल जुड़कर बदल जाता है.*

*इसी प्रावधान की वजह से लोकसभा की 543 में से 79 सीटें अनुसूचित जाति और 41 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व हो जाती हैं. वहीं, विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं.*

*इन सीटों पर वोट तो सभी डालते हैं, लेकिन कैंडिडेट सिर्फ एससी या एसटी का होता है.*

लोकसभा और विधानसभाओं में *आज़ादी के समय से ही* अनुसूचित जाति और जनजाति का उनकी *आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहा है.*

*सवाल यह उठता है कि इतने सारे दलित और आदिवासी सांसद और विधायक अपने समुदाय के लिए करते क्या हैं?*

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के इस साल जारी आंकड़ों के मुताबिक *इन समुदायों के उत्पीड़न के साल में 40,000 से ज़्यादा मुकदमे दर्ज हुए.* यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है. जाहिर है कि *इन आंकड़ों के पीछे एक और आंकड़ा उन मामलों का होगा, जो कभी दर्ज ही नहीं होते हैं.*

*क्या दलित उत्पीड़न की इन घटनाओं के ख़िलाफ़ दलित सांसदों या विधायकों ने कोई बड़ा, याद रहने वाला आंदोलन किया है?*

*ऐसे सवालों पर, संसद कितने बार ठप की गई है और ऐसा रिज़र्व कैटेगरी के सांसदों ने कितनी बार किया है?*

हमने देखा है कि तेलंगाना से आने वाले *दसेक सांसदों ने कई हफ़्ते तक संसद की गतिविधियों को बाधित रखा.*

*कोई वजह नहीं है कि लगभग सवा सौ एससी और एसटी सांसद अगर चाह लें तो संसद में इससे कई गुना ज़्यादा असर पैदा कर सकते हैं.* लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं है.

इसी तरह, *सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जाति और जनजाति को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है*

लेकिन *केंद्र और राज्य सरकारें अक्सर यह सूचना देती हैं कि इन जगहों पर कोटा पूरा नहीं हो रहा है.*

*ख़ासतौर पर उच्च पदों पर, अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे का हाल बेहद बुरा है.* जैसे कि हम देख सकते हैं कि *देश की 43 सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक भी वाइस चांसलर अनुसूचित जाति का नहीं है या कि केंद्र सरकार में सेक्रेटरी स्तर के पदों पर अक्सर एससी या एसटी का कोई अफसर नहीं होता.*

*शासन के उच्च स्तरों पर अनुसूचित जाति और जनजाति की अनुपस्थिति क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों के लिए चिंता का विषय है?* अगर वे इसके लिए चिंतित हैं, तो उन्होंने सरकार पर कितना दबाव बनाया है? *क्या इस सवाल पर कभी संसद के अंदर कोई बड़ा आंदोलन या हंगामा हुआ?* ज़ाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.

चूंकि सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घट रही है और हाल के वर्षों में *निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठी है,*

*लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों और विधायकों के लिए यह कोई मुद्दा है?*

इसी तरह की एक मांग *उच्च न्यायपालिका में आरक्षण की भी है. ख़ासकर संसद की कड़िया मुंडा कमेटी की रिपोर्ट में न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व की बात आने के बाद से यह मांग मज़बूत हुई है. लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों ने कभी इस मुद्दे पर संसद में पुरज़ोर तरीक़े से मांग उठाई है?*

*120 से ज़्यादा एससी और एसटी सांसदों के लिए किसी मुद्दे पर संसद में हंगामा करना और दबाव पैदा करना मुश्किल नहीं है. इन सांसदों का एक ग्रुप भी है और जो अक्सर मिलते भी हैं लेकिन देश ने कभी इन सांसदों को अपने समुदायों के ज़रूरी मुद्दों पर आंदोलन छेड़ते नहीं देखा है.*

Wednesday, 9 January 2019

मोदी का आज का फैसला संविधान की आत्मा और आरक्षण का निर्मम कत्ल है।*

*मोदी का आज का फैसला संविधान की आत्मा और आरक्षण का निर्मम कत्ल है।*

संविधान प्रदत्त आरक्षण की आत्मा गरीबी नहीं है ।

*संविधान शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देता है।*

ओबीसी के एक बड़े तबके /हिस्से को क्रीमीलेयर लगाकर पिछले 25 सालों से रिजर्वेशन से आउट कर के रखा था और वर्तमान क्रीमीलेयर के लिए आय सीमा भी 8 लाख ही है। जिससे बहुत सारे पिछड़े जो हमारे भाई बंधु है वह कभी इस सिस्टम में नहीं घुस पाए। 

यही आरक्षण मोदी ने आठ लाख की *आर्थिक सीमा तय  करके सवर्ण कास्ट को दे दिया है हमें इससे कोई दिक्कत नहीं कि आप जनरल का 10 परसेंट या 15 परसेंट दो ।* हमें दिक्कत है इस बात से है कि वर्तमान में  हमारी आबादी लगभग 65% है।
और हमें हमारी आबादी के हिसाब से आरक्षण मिलना चाहिए और अब कोई क्रीमीलेयर नहीं चलेगी ,और *65 %आरक्षण ओबीसी को नहीं दिया और क्रीमी लेयर नहीं हटाया, तो यह देश जलेगा ये मेरा वचन है।*

अगर संविधान संशोधन होगा तो ओबीसी के लिए भी होगा।

जय फुले जय अंबेडकर।

Friday, 4 January 2019

मौलिक जानकारी

तुलसीदास दुबे ने अपने नीचता भरे ग्रंथ में राम का बहाना दे कर खुद शूद्रों(obc, sc st)को गा कर गाली दिया और आज भी शूद्र यानी बहुजन(obc sc st) वही रामायण गा गा कर खुद को हो गाली देता है।कभी रामायण में लिखी नीचता का अर्थ नही समझता।।।।

चलिए आज आपको रामायण में लिखी नीचता को दिखाते हैं👇👇

🔴 *मौलिक जानकारी*🔴

जानकारी के अभाव मे शूद्र(obc sc st)लोग अपने पूर्वज के हत्यारा का जाप करते है।
    जिस रामायण मे जात के नाम से गाली दिया गया है, उसी रामायण को शूद्र लोग रामधुन  ( अष्टयाम ) मे अखण्ड पाठ करते है, और अपने को गाली देते है । और मस्ती मे झाल बजाकर निम्न दोहा पढते है :-

*जे बरनाधम  तेलि  कुम्हारा,स्वपच किरात कोल कलवारा*।।

(तेली, कुम्हार, किरात, कोल, कलवार आदि सभी जातियां नीच 'अधम' वरन के होते हैं)

*नारी मुई गृह संपत्ति नासी, मूड़ मुड़ाई होहिं संयासा*
                (उ•का• 99ख  03)

(घर की नारी 'पत्नी' मरे तो समझो एक सम्पत्ति का नाश हो गया, फिर दुबारा दूसरी पत्नी ले आना चाहिए, पर अगर पति की मृत्यु हो जाए तो पत्नी को सिर मुंड़वाकर घर में एक कोठरी में रहना चाहिए, रंगीन कपड़े व सिंगार से दूर तथा दूसरी शादी करने की शख्त मनाही होनी चाहिए)

*ते बिप्रन्ह सन आपको पुजावही,उभय लोक निज हाथ नसावही*

(जो लोग ब्रह्मण से सेवा/ काम लेते हैं, वे अपने ही हाथों स्वर्ग लोक का नाश करते हैं)

*अधम जाति मै विद्दा पाए। भयऊँ जथा अहि दूध पिआएँ*
       (उ०का० 105 क 03)

(नीच जाति विद्या/ज्ञान प्राप्त करके वैसे ही जहरीले हो जाते हैं जैसे दूध पिलाने के बाद साँप)        

*आभीर(अहिर)जमन किरात खस,स्वपचादि अति अधरूप    जे*!!
           (उ• का• 129  छं•01 )

*काने खोरे कूबरे कुटिल कुचली जानि*।।
(अ• का• दोहा 14)

(दिव्यांग abnormal का घोर अपमान, जिन्हें भारतीय संविधान ने उन्हें तो एक विशेष इंसान का दर्जा दिया & विशेष हक-अधिकार भी दिये)

*सति हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्वग्य,कीन्ह कपटु मै संभु सन नारी सहज अग्य*
(बा • का• दोहा 57क)
( नारी स्वभाव से ही अज्ञानी)

*ढोल गवार शूद्र पशू नारी,सकल ताड़न के अधिकारी* ।।

(ढोल, गंवार और पशुओं की हीे तरह *शूद्र*(obc sc st) एव साथ-साथ *नारी* को भी पीटना चाहिए)
    ( सु•का•  दोहा 58/ 03)

*पुजिए बिप्र शील गुण हीना,शूद्र न पुजिए गुण ज्ञान प्रविना*

(ब्रह्मण चाहे शील-गुण वाला नहीं *है फिर भी पूजनीय हैं और शूद्र (SC,ST,OBCs)चाहे कितना भी शीलवान,गुणवान या ज्ञानवान हो मान-सम्मान नहीं देना चाहिए)

    इस प्रकार से अनेको जगह जाति एवं वर्ण के नाम रखकर अपशब्द बोला गया है ।पुरे रामचरितमानस व रामायण मे जाति के नाम से गाली दिया गया है।

     इसी रामायण मे बालकाण्ड के दोहा 62  के  श्लोक 04  मे कहा गया है, कि जाति अपमान सबसे बड़ा अपमान है

इतना अपशब्द लिखने के बाद भी हमारा समाज ( शूद्र , sc, st, obc ) रामायण को सीने से लगा कर रखे हुए है, और हजारो , लाखो रूपये खर्च कर रामधुन  ( अष्टयाम ) कराते है ।कर्ज मे डूबे रहते है ।बच्चे को सही शिक्षा नही देते है ।और कहते है कि भगवान के मर्जी है ।

कुछ लोग पढ़ने-लिखने के पश्चात (बाबासाहब डाॅ भीमराव अंबेडकर जी के लिखे गए संविधान के आधार पर )नौकरी पाते है, और कहते है, कि ये सब राम जी के कृपा से हुआ है।।

    यदि आप राम  ( भगवान ) के कृपा से ही पढे लिखे और नौकरी पाए तो , आपके पिताजी ,दादाजी, परदादाजी ,लकरदादाजी & दादी, नानी, परदादी, परनानी इत्यादि भी पढे लिखे होते नौकरी पेशा मे होते!!  यदि सब राम  (भगवान )के  कृपा   से  ही  हुआ है, तो  आप बताइए कि  अंग्रेज़ के राज के पहले एक भी  शूद्र ( sc, st, obc and minority ) पढ़ा लिखा विद्वान बना हो?

    मेरे प्यारों!!
आप (शूद्र अर्थात मूलनिवासी sc, st, obc and minority ) जो भी कुछ है, भारतीय संविधान के बल पर ही है।

       *इसलिए हम सब का परम कर्तव्य बनता है कि भारतीय संविधान की रक्षा करें*

         क्योंकि    भारतीय    संविधान अभी    खतरे   मे है , इसे ब्राह्मणी  (सवर्णो का ) संगठन  (RSS)  ध्वस्त करने पर लगा हुआ है ।
और हमलोग हाथ पर हाथ रख कर सोय हुए है ।ब्राह्मणो के षडयंत्र मे फंसकर धर्म कार्य  (अंधभक्ति ) मे लगे हुए है ।

         

( विशेष जानकारी के लिए RSS दूसरे सर संचालक गोलवरकर द्वारा लिखित पुस्तक बंच आॅफ थाॅट्स की अध्ययन किया जाए, जिसमे लिखा है कि भारतीय संविधान जहरिला बीज है, इसे समाप्त कर देना चाहिए )

साथियो हमारा सबसे बड़ा धर्म  ( कर्तव्य ) है , भारतीय संविधान की रक्षा करना ।

(भारत की आधी आबादी  महिलाएँ भी स्वतंत्र अस्तित्त्व के इंसान हैं, पुरूषों की ही तरह)

अर्द्धनारीश्वर/अर्द्धांगिनी शब्द ही गलत है। किसी भी इंसान का शरीर आधा नारी का  & आधा पुरुष का हो ही नहीं सकता। अगर सही है तो एक पत्नी के मरते समय पति की भी मृत्यु हो जानी चाहिए।

*जय भारतीय संविधान*
*जय भीम*

मूलनिवासी इतिहास

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