Tuesday, 11 October 2016

बेटियां

*बहुत खुबसूरत मैसेज*
   
👉बेटियाँ सब के नसीब में
      कहाँ होती है..
👉रब को जो घर पसंद आए
      वहाँ होती है बेटियां

   ==👧👧👭👧👧==

        🔰🚥🚥🔰

🌿➖बोये जाते हैं बेटे..
🌿➖पर उग जाती हैं
           बेटियाँ..

🌿➖खाद पानी बेटों को..
🌿➖पर लहराती हैं बेटियां.

🌿➖स्कूल जाते हैं बेटे..
🌿➖पर पढ़ जाती हैं
          बेटियां..

🌿➖मेहनत करते हैं बेटे..
🌿➖पर अव्वल आती हैं
          बेटियां..

🌿➖रुलाते हैं जब खूब बेटे.
🌿➖तब हंसाती हैं बेटियां.

🌿➖नाम करें न करें बेटे..
🌿➖पर नाम कमाती हैं
          बेटियां..

🌿➖जब दर्द देते हैं बेटे...
🌿➖तब मरहम लगाती
         हैं बेटियां..

🌿➖छोड़ जाते हैं जब बेटे..
🌿➖तो काम आती हैं
          बेटियां..

🌿➖आशा रहती है बेटों से.
🌿➖पर पूर्ण करती हैं
           बेटियां..

🌿➖हजारों फरमाइश से
           भरे हैं बेटे....
🌿➖पर समय की नज़ाकत
          को समझती बेटियां..
🌿➖बेटी को चांद जैसा
          मत बनाओ कि हर
         कोई घूर घूर कर देखे..

       📍लेकिन📍
    -----------------------
🌿➖बेटी को सूरज जैसा
         बनाओ ताकि घूरने से
        पहले सब की नजर झुक
        जाये..🌞🌞

     

✔==Send it to Your
        ➖Sister•
        ➖Friends•
        ➖Daughter•
        ➖Wife•
              

त्यौहार क्या हैं?

"भारतीय त्योहारों का इतिहास और कुच्छ नही  बस आर्य ब्राम्हणों कि जीत का जश्न है.
ब्राम्हणों के हर त्योहारों के पीछे मूलनिवासी महापुरूषों कि हत्या, बर्बादी  का राज छिपा है"

                   *-- बाबासाहेब आम्बेडकर*

त्यों = तुम्हारी
हार = हार

*(त्यौहार = तुम्हारी हार)*

सबसे बड़ी देशभक्ति

*इतना गुस्सा बाप रे बाप ।*

*बहुत गुस्से में है भारत की पब्लिक ।*

*बहिष्कार करो चीनी सामान का*

*खत्म कर दो पाकिस्तान को !!!*

परमाणु बम गिरा दो!!!
तबाह कर दो !!!!!
उसको उसकी औकात याद दिला दो.
फलां फलां !!!

बहुत बहुत प्यार करते है अपने देश को
और बहुत गुस्से में है सब देशप्रेमी..........

बसों, ट्रेनों, सीढियों पर पान गुटके थूकने वाले देशप्रेमी.

रोंग साइड से वाहन निकलने की जुगाड में लगे हुए देशप्रेमी.

सडको पर पहले निकलने की कोशिश में ट्राफिक जाम करने वाले देशप्रेमी.

सालों से टैक्स चोरी कर रहे देशप्रेमी.


2G, 3G, कोयला जैसे घोटालो को भूल जाने वाले देशप्रेमी

ब्यापम, ललित मोदी, विजय माल्या जैसे घोटालो को भूल जाने वाले देशप्रेमी

84 और 2002 दो जैसे दंगो को भूल जाने वाले और फिर से उन्ही के हात में सत्ता सोपने वाले देशप्रेमी

अपने देश के लोगो की कमाई ना हो जाये इस लिए और  अपनी ना कामी को छुपाने के लिए चीन से क्यूटो जैसी सिटी अपने देश में बनबाने बनबाने वाले देशप्रमी

चीन से सरदार पटेल की मूर्ति बनवाने वाले देशप्रमी
 

अपने फायदे के लिए पाकिस्तान को बिजली बेचने बाले देशप्रमी

अंडरवर्ल्ड के पैसो से बनी फिल्मो को 300-400 करोड का फायदा पहुचने वाले देशप्रेमी.


अलग अलग प्रदेशो के नाम पर लडने वाले देशप्रेमी.

अलग अलग भाषा वालो से नफ़रत करने वाले देशप्रेमी.

पानी के लिए लडने सरकारी संपत्तियो को स्वाहा करने वाले देशप्रेमी.

आरक्षण के लिए संपत्तियो को स्वाहा करने वाले देशप्रेमी.

गाय के नाम पर जातिवादी लड़ाई लडने वाले देशप्रेमी.

गाय के नाम पर तथा कथित हिन्दू अपने से छोटी जाती वालो को पीटने वाले देशप्रेमी


ट्रेनों के संडासो में गंदे तरीको से शौच कर पानी न डालने वाले देशप्रेमी.

खुली सडको पर बेशर्मो की तरह पेशाब वाले देशप्रेमी.

जाती के नाम पर अपने से पैसे में कमजोर को जलील करने वाले देशप्रमी

अपने ही देश के लोगो को जाती और धर्म के नाम पर लड़वाने वाले देशप्रमी

नन्हे मासूमो और औरतो की इज्जत तार तार करने वाले देशप्रेमी.

अपने से कमजोर वर्ग को मिल रहे आरक्षण जिस से की वो लोग भी देश के सभी लोगो के साथ विकाश  की धारा में बराबर आ सके उनका भी विरोध करने वाले देशप्रेमी

ट्रेनों में रिश्वत देकर टिकट की जुगाड करने वाले देशप्रेमी.

बिजली के खम्बो पर तार डालकर बिजली चुराने वाले देशप्रेमी.

मंदिरों में निचली जाती वालो को न घुसने देने वाले देशप्रेमी.

जहरीला मिलावटी सामान बेचने वाले देशप्रेमी.

एक दूसरे से और दूसरों की तरक्कियो से जलने वाले देशप्रेमी.

धर्म के नाम पर दंगा करवाने वाले देशप्रेमी

सेना को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाले देशप्रेमी

कोई तथाकथित छोटी जाती वाला किसी बड़ी जाती वाले के बराबर आ जाये तो उस छोटी जाती वाले का विरोध करने वाले देशप्रेमी

सचमुच बहुत गुस्से में है ऐसे देशप्रेमी.

सलाम ऐसे देश प्रेमियों को.......

*देश के हालात पर कुछ लिखने की हिमत की है अच्छा लगे तो इस पोस्ट को हर भारतवासी तक पंहुचा दो कम से कम 10 लोगो को भेजो फिर देखते है आपको अपने देश से कितना प्रेम है*....

🤔🤔🤔

*अशोक विजयदशमी विशेष*

नमो बुद्धस्स जय भीम
🐘 जय बहुजन समाज 🐘

🔅 *अशोक  विजयदशमी विशेष* 🔅

*सम्राट अशोक*
राजकाल-       ३०४ ईसा पूर्व से २३२ ईसा पूर्व।
राज्याभिषेक- २७० ईसा पूर्व।
*जन्म*-            ३०४ ईसा पूर्व
पाटलिपुत्र, पटना।
*मृत्यु*-            २३२ ईसा पूर्व
पाटलिपुत्र, पटना।
*उत्तराधिकारी*-दशरथ मौर्य।
*पत्नी*-             देवी (वेदिस-महादेवी शाक्यकुमारी)
कारुवाकी (द्वितीय देवी तीवलमाता)।
असंधिमित्रा  अग्रमहिषी,
अहंकारा ,
पद्मावती
तिष्यरक्षिता

*वंश*-            मौर्य
*पिता*-           बिन्दुसार
*माता*-           सुभद्रांगी (उत्तरी परम्परा), रानी धर्मा (दक्षिणी परम्परा)
------------------------
चक्रवर्ती सम्राट अशोक का पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय)। (राजकाल ईसापूर्व 273-232) प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश का चक्रवर्ती राजा था। उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़गानिस्तान तक पहुँच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है।[1][2]

जीवन के उत्तरार्ध में सम्राट अशोक भगवान बुद्ध की मानवतावादी शिक्षाओं से प्रभावित होकर बौद्ध हो गये और उन्ही की स्मृति मे उन्होने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल - लुम्बिनी - मे मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तम्भ के रुप मे देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। अशोक अपने पूरे जीवन मे एक भी युद्ध नहीं हारे। सम्राट अशोक के ही समय में 23 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई जिसमें तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, कंधार आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे। इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से कई छात्र शिक्षा पाने भारत आया करते थे।

*कलिंग की लड़ाई*
अशोक ने अपने राज्याभिषेक के ८वें वर्ष (२६१ ई. पू.) में कलिंग पर आक्रमण किया था। आन्तरिक अशान्ति से निपटने के बाद २६९ ई. पू. में उसका विधिवत्‌ अभिषेक हुआ तेरहवें शिलालेख के अनुसार कलिंग युद्ध में एक लाख ५० हजार व्यक्‍ति बन्दी बनाकर निर्वासित कर दिए गये, एक लाख लोगों की हत्या कर दी गयी। सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आँखों से देखा। इससे द्रवित होकर अशोक ने शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धार्मिक प्रचार किया।
कलिंग युद्ध ने अशोक के हृदय में महान परिवर्तन कर दिया। उसका हृदय मानवता के प्रति दया और करुणा से उद्वेलित हो गया। उसने युद्धक्रियाओं को सदा के लिए बन्द कर देने की प्रतिज्ञा की। यहाँ से आध्यात्मिक और धम्म विजय का युग शुरू हुआ। उसने बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया।

सिंहली अनुश्रुतियों दीपवंश एवं महावंश के अनुसार अशोक को अपने शासन के चौदहवें वर्ष में निगोथ नामक भिक्षु द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गई थी। तत्पश्‍चात्‌ मोगाली पुत्र निस्स के प्रभाव से वह पूर्णतः बौद्ध हो गया था। दिव्यादान के अनुसार अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षुक को जाता है। अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में सर्वप्रथम बोधगया की यात्रा की थी। तदुपरान्त अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की थी तथा लुम्बिनी ग्राम को करमुक्‍त घोषित कर दिया था।

*बौद्ध धर्म अंगीकरण*

कलिंग युद्ध में हुई क्षति तथा नरसंहार से उसका मन युद्ध से ऊब गया और वह अपने कृत्य को लेकर व्यथित हो उठा। इसी शोक से उबरने के लिए वह बुद्ध के उपदेशों के करीब आता गया और अंत में उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया।

बौद्ध धर्म स्वीकारने के बाद उसने उसे अपने जीवन मे उतारने का प्रयास भी किया। उसने शिकार तथा पशु-हत्या करना छोड़ दिया। उसने ब्राह्मणों एवं अन्य सम्प्रदायों के सन्यासियों को खुलकर दान देना भी आरंभ किया। और जनकल्याण के लिए उसने चिकित्यालय, पाठशाला तथा सड़कों आदि का निर्माण करवाया।
उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्म प्रचारकों को नेपाल, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, मिस्र तथा यूनान भी भेजा। इसी कार्य के लिए उसने अपने पुत्र एवं पुत्री को भी यात्राओं पर भेजा था। अशोक के धर्म प्रचारकों में सबसे अधिक सफलता उसके पुत्र महेन्द्र को मिली। महेन्द्र ने श्रीलंका के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया, और तिस्स ने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना लिया और अशोक से प्रेरित होकर उसने स्वयं को 'देवनामप्रिय' की उपाधि दी।

अशोक के शासनकाल में ही पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोगाली पुत्र तिष्या ने की। यहीं अभिधम्मपिटक की रचना भी हुई और बौद्ध भिक्षु विभिन्‍न देशों में भेजे गये जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा भी सम्मिलित थे, जिन्हें श्रीलंका भेजा गया।

अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और साम्राज्य के सभी साधनों को जनता के कल्याण हेतु लगा दिया। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए निम्नलिखित साधन अपनाये-

(क) धर्मयात्राओं का प्रारम्भ,
(ख) राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्‍ति,
(ग) धर्म महापात्रों की नियुक्‍ति,
(घ) दिव्य रूपों का प्रदर्शन,
(च) धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था,
(छ) लोकाचारिता के कार्य,
(ज) धर्मलिपियों का खुदवाना,
(झ) विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजना आदि।
अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार का प्रारम्भ धर्मयात्राओं से किया। वह अभिषेक के १०वें वर्ष बोधगया की यात्रा पर गया। कलिंग युद्ध के बाद आमोद-प्रमोद की यात्राओं पर पाबन्दी लगा दी। अपने अभिषेक २०वें वर्ष में लुम्बिनी ग्राम की यात्रा की। नेपाल तराई में स्थित निगलीवा में उसने कनकमुनि के स्तूप की मरम्मत करवाई। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने साम्राज्य के उच्च पदाधिकारियों को नियुक्‍त किया। स्तम्भ लेख तीन और सात के अनुसार उसने व्युष्ट, रज्जुक, प्रादेशिक तथा युक्‍त नामक पदाधिकारियों को जनता के बीच जाकर धर्म प्रचार करने और उपदेश देने का आदेश दिया।

अभिषेक के १३वें वर्ष के बाद उसने बौद्ध धर्म प्रचार हेतु पदाधिकारियों का एक नया वर्ग बनाया जिसे 'धर्म महापात्र' कहा गया था। इसका कर्य विभिन्‍न धार्मिक सम्प्रदायों के बीच द्वेषभाव को मिटाकर धर्म की एकता स्थापित करना था।

विद्वानों अशोक की तुलना विश्‍व इतिहास की विभूतियाँ कांस्टेटाइन, ऐटोनियस, अकबर, सेन्टपॉल, नेपोलियन सीजर के साथ की है।

अशोक ने अहिंसा, शान्ति तथा लोक कल्याणकारी नीतियों के विश्‍वविख्यात तथा अतुलनीय सम्राट हैं। एच. जी. वेल्स के अनुसार अशोक का चरित्र “इतिहास के स्तम्भों को भरने वाले राजाओं, सम्राटों, धर्माधिकारियों, सन्त-महात्माओं आदि के बीच प्रकाशमान है और आकाश में प्रायः एकाकी तारा की तरह चमकता है।"

*शिलालेख*
सम्राट अशोक द्वारा प्रवर्तित कुल ३३ अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिन्हें अशोक ने स्तंभों, चट्टानों और गुफ़ाओं की दीवारों में अपने २६९ ईसापूर्व से २३१ ईसापूर्व चलने वाले शासनकाल में खुदवाए। ये आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं।

इन शिलालेखों के अनुसार अशोक के बौद्ध धर्म फैलाने के प्रयास भूमध्य सागर के क्षेत्र तक सक्रिय थे और सम्राट मिस्र और यूनान तक की राजनैतिक परिस्थितियों से भलीभाँति परिचित थे। इनमें बौद्ध धर्म की बारीकियों पर ज़ोर कम और मनुष्यों को आदर्श जीवन जीने की सीखें अधिक मिलती हैं। पूर्वी क्षेत्रों में यह आदेश प्राचीन मगधी भाषा में ब्राह्मी लिपि के प्रयोग से लिखे गए थे। पश्चिमी क्षेत्रों के शिलालेखों में भाषा संस्कृत से मिलती-जुलती है और खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया गया। एक शिलालेख में यूनानी भाषा प्रयोग की गई है, जबकि एक अन्य में यूनानी और अरामाई भाषा में द्विभाषीय आदेश दर्ज है। इन शिलालेखों में सम्राट अपने आप को "प्रियदर्शी" (प्राकृत में "पियदस्सी") और देवानाम्प्रिय (यानि देवों को प्रिय, प्राकृत में "देवानम्पिय") की उपाधि से बुलाते हैं।
*मृत्यु*
अशोक ने लगभग 40 वर्षों तक शासन किया जिसके बाद लगभग 234 ईसापूर्व में उसकी मृत्यु हुई। उसके कई संतान तथा पत्नियां थीं पर उनके बारे में अधिक पता नहीं है। उसके पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा ने बौद्ध धर्म के प्रचार में योगदान दिया।

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य राजवंश लगभग 50 वर्षों तक चला।
मगध तथा भारतीय उपमहाद्वीप में कई जगहों पर उसके अवशेष मिले हैं। पटना (पाटलिपुत्र) के पास कुम्हरार में अशोककालीन अवशेष मिले हैं। लुम्बिनी में भी अशोक स्तंभ देखा जा सकता है। कर्नाटक के कई स्थानों पर उसके धर्मोपदेशों के शिलोत्कीर्ण अभिलेख मिले हैं।
काल्पनिक कथाओं के सहारे
मानवता को शर्मिन्दा करने वाला
ब्राह्मणवाद
जिसका मतलब
गैर बराबरी
छुआछूत
स्ञी दासता
असमानता
आदिवासियों का पृथक्करण करके उनको सिविल सोसाइटी से दुर रखना
धर्म के नाम पर मुसलमानों को काल्पनिक दुश्मन बनाकर
SC/ST/OBC के लोगों को जो कि शुद्र अतिशुद्र हैं
को हिन्दू धर्म कि चादर ओढा कर सत्ता लेकर
SC/ST/OBC and minority के लोगों पर अलग अलग से अत्याचार करना
उनके संवैधानिक अधिकारों को षडयंत्र पुर्वक
निजिकरण करके
वैश्वीकरण करके
नये नये कानून बना कर छिनना
SAG के बहाने
आदिवासियों कि बेशकीमती जमीन को उधोगपतियों को कोडियो के दाम में देना
सभी मूलनिवासी बहुजनों को षडयंत्र करके
उनको एक नहीं होने देना
उनको हमेशा गरीब रखना ताकि वो कभी पेट के अलावा सोच ही नहीं सके

इसलिए अब

सिर्फ और सिर्फ
ब्राह्मणवाद जलेगा
सिर्फ ब्राह्मणवाद का दहन होगा

Tuesday, 23 August 2016

मूलनिवासी

⛅ *बहुत सुँदर पंक्तियाँ* ☺👌
👉पशु को गोद खिलाने वाले,
मुझको छूने से बचते थे।
मेरी छाया पड जाने पर,
'गोमूत्र का छीँटा' लेते थे।।
👉पथ पर पदचिन्ह न शेष रहेँ
झाडू बाँध निकलना होता।
धरती पर थूक न गिर जाये,
हाथ सकोरा रखना होता।।
👉जान हथेली पर रखकर,
मैँ गहरे कुआँ खोदता था।
चाहे प्यासा ही मर जाऊँ,
कूपजगत ना चढ सकता था
👉मलमूत्र इकट्ठा करके मैँ,
सिर पर ढोकर ले जाता था।
फिकी हुई बासी रोटी,
बदले मेँ उसके पाता था।।
👉मन्दिर मैँ खूब बनाता था,
जा सकता चौखट पार नहीँ।
मूरत गढता मैँ ठोक-ठोक,
था पूजा का अधिकार नहीँ।
👉अनचाहे भी यदि वेदपाठ,
कहीँ कान मेरे सुन लेते थे।
तो मुझे पकडकर कानोँ मेँ,
पिघला सीसा भर देते थे।।
👉गर वेद शब्द निकला मुख से
तो जीभ कटानी पड जाती।
वेद मंत्र यदि याद किया,
तो जान गँवानी पड जाती।।
👉था बेशक मेरा मनुजरूप,
जीवन बदतर था पशुओँ से।
खा ठोकर होकर अपमानित,
मन को धोता था अँसुओँ से।
👉फुले पैरियार ललई साहू,
ने मुझे झिँझोड जगाया था।
संविधान के निर्माता ने,
इक मार्ग नया दिखाया था।।
👉उसी मार्ग पर मजबूती से,
आगे को कदम बढाया है।
होकर के शिक्षित और सजग,
खोया निज गौरव पाया है।।
👉स्वाभिमान जग जाने से,
स्थिति बदलती जाती है।
मंजिल जो दूर दीखती थी,
लगरहा निकट अब आती है।
👉दर से जो दूर भगाते थे,
दर आकर वोट माँगते हैँ।
छाया से परे भागते थे,
वो मेरे चरण लागते हैँ।।
👉वो मुझसे पढने आते हैँ,
जो मुझे न पढने देते थे।
अब पानी लेकर रहैँ खडे,
तब कुआँ न चढने देते थे।।
👉"बाबा" तेरे उपकारोँ को,
मैँ कभी भुला ना पाऊँगा।
"भीम" जो राह दिखायी है,
उस पर ही बढता जाऊँगा।।
⛅ *बहुत सुँदर पंक्तियाँ* ☺👌
👉पशु को गोद खिलाने वाले,
मुझको छूने से बचते थे।
मेरी छाया पड जाने पर,
'गोमूत्र का छीँटा' लेते थे।।
👉पथ पर पदचिन्ह न शेष रहेँ
झाडू बाँध निकलना होता।
धरती पर थूक न गिर जाये,
हाथ सकोरा रखना होता।।
👉जान हथेली पर रखकर,
मैँ गहरे कुआँ खोदता था।
चाहे प्यासा ही मर जाऊँ,
कूपजगत ना चढ सकता था
👉मलमूत्र इकट्ठा करके मैँ,
सिर पर ढोकर ले जाता था।
फिकी हुई बासी रोटी,
बदले मेँ उसके पाता था।।
👉मन्दिर मैँ खूब बनाता था,
जा सकता चौखट पार नहीँ।
मूरत गढता मैँ ठोक-ठोक,
था पूजा का अधिकार नहीँ।
👉अनचाहे भी यदि वेदपाठ,
कहीँ कान मेरे सुन लेते थे।
तो मुझे पकडकर कानोँ मेँ,
पिघला सीसा भर देते थे।।
👉गर वेद शब्द निकला मुख से
तो जीभ कटानी पड जाती।
वेद मंत्र यदि याद किया,
तो जान गँवानी पड जाती।।
👉था बेशक मेरा मनुजरूप,
जीवन बदतर था पशुओँ से।
खा ठोकर होकर अपमानित,
मन को धोता था अँसुओँ से।
👉फुले पैरियार ललई साहू,
ने मुझे झिँझोड जगाया था।
संविधान के निर्माता ने,
इक मार्ग नया दिखाया था।।
👉उसी मार्ग पर मजबूती से,
आगे को कदम बढाया है।
होकर के शिक्षित और सजग,
खोया निज गौरव पाया है।।
👉स्वाभिमान जग जाने से,
स्थिति बदलती जाती है।
मंजिल जो दूर दीखती थी,
लगरहा निकट अब आती है।
👉दर से जो दूर भगाते थे,
दर आकर वोट माँगते हैँ।
छाया से परे भागते थे,
वो मेरे चरण लागते हैँ।।
👉वो मुझसे पढने आते हैँ,
जो मुझे न पढने देते थे।
अब पानी लेकर रहैँ खडे,
तब कुआँ न चढने देते थे।।
👉"बाबा" तेरे उपकारोँ को,
मैँ कभी भुला ना पाऊँगा।
"भीम" जो राह दिखायी है,
उस पर ही बढता जाऊँगा।।

आंदोलन

आधुनिक भारत में  आजादी के दो आंदोलन

📚📚📚📚📚📚📚📚🤔
आधुनिक भारत में काँग्रेस (ब्राह्मणों के संगठन ) के माध्यम से अंग्रेजों कि  गुलामी से आजादी पाने का गोखले, तिलक  , गांधी , नेहरू के माध्यम से एक आंदोलन चला।
दुसरा ब्राह्मणों की गुलामी से आजादी पाने का आंदोलन 1848 से 1956 तक चलाया गया। यह आंदोलन ज्योतिराव जी फुले (OBC), शाहुजीमहाराज (OBC) बाबा साहब आंबेडकर इनके दवारा बहुजन मूलनिवासियों कि आजादी के लिए चलाया गया।
काँग्रेस ने चलाए आजादी के आंदोलन गोखले, तिलक, गांधी, नेहरू के साथ फूले, शाहू, आंबेडकरने नही चलाया बल्कि उनका अलग आजादी याने की गोखले, टिलक, गांधी, नेहरू के गुलामी से मुक्त होने का आंदोलन चलाया । यानि कि  भारत मेँ आजादी के दो आंदोलन चले। याने  ज्योति राव फुले जी शाहूजी महाराज , बाबा साहब आंबेडकर काँग्रेस मेँ शामिल नही हुए।
क्योंकि यह ब्राह्मणों का
ब्राह्मणों कि आजादी के लिए बनाया गया संगठन था
उससे  विदेशी ब्राह्मण आजाद हुए और मुलनिवासी बहुजन विदेशी ब्राह्मणों  के गुलाम हो गये।
यानि

आजादी का आंदोलन मुलनिवासी बहुजनों कि आजादी का आंदोलन नही था,
 बल्कि विदेशी ब्राह्मणों के आजादी का आंदोलन था।
हमें  पाठ्यक्रम में एक ही आजादी का आंदोलन पढाया जाता है जो काँग्रेस(ब्राह्मणों का संगठन ) के माध्यम से गोखले, तिलक , गांधी, नेहरूद्वारा चलाया जाता है।
 तो दुसरा आन्दोलन  ज्योतिराव फूले, शाहुजी ,बाबा साहब  आंबेडकर इनके द्वारा ब्राम्हणोँ के गुलामी से चलाया गया आजादी का आंदोलन पढाया नही जाता। अगर भारत मेँ आजादी के दो आंदोलन चले तो लोग विचार करेंगे की भारत में दो आंदोलन क्यों चले?
 इस पर मुलनिवासी विचार विमर्श करेगें उनके साथ की जा रही धोखेबाजी  का भांडोफोड हो जाएगा इसलिए  आजादी दुसरा आंदोलन पढाया नही जाता।
 इसलिए बहुजन मूलनिवासियों की समस्या जैसे की जैसी है।
मूलनिवासी बहुजन बुध्दिजीवी वर्ग इस आंदोलन को समझने की कोशिश करेगें  इसके ऊपर विचार विमर्श करेंगे।
बहुजन महापुरुषों का अधुरा कार्य पुरा करने का कार्य बामसेफ भारत मुक्ति मोर्चा कर रहा है आप इसमे शामिल हो जाओ। —
        15 August मूलनिवासियों की आजादी का दिन नही है , बल्कि ब्राह्मणो की आजादी का दिन है , भारत का मुलनीवासी आज भी गुलाम है ।

1848 में , ज्योतिराव फुले जीे ने मूलनिवासियों  कि आजादी का आंदोलन शुरू  किया था ,
तब गांधी पैदा भी नहीं हुए  थे ।

ज्योतिराव फुले जी नें 1848 में  मूलनिवासियों कि आजादी का आंदोलन शुरू  किया था , उसके 21 साल बाद गांधी पैदा हुए थे 1869 में ।

इसका मतलब है कि , अंग्रेज़ों से आजादी का आंदोलन मूलनिवासियों  की आजादी का आंदोलन नही था ,
मूलनिवासियों  कि आजादी का आंदोलन तो ज्योतिराव फुल जीे नें  1848 में ही शुरू  कर दिया था ।
ऐक बात सोचो कि जब  अंग्रेज  भारत में आये ही नहीं थे , मुगल भारत में आये ही नहीं थे , तब भारत किसका गुलाम था , .?
तब हम किसके गुलाम थे
तब हमारे पर अत्याचार शोषण कौन कर रहा था ।
यह बात हमारे लोगों को सोचनी चाहिए ,
अंग्रेज  भारत छोडकर चले गये . इस बात को आजादी मानकर चलना यही गलत बात है ,क्योंकि ज्योतिराव फुले , शाहुजी महाराज ,ओर
 बाबासाहेब आंबेडकर जी  यह मानते थे कि अंग्रजों  ने हमको गुलाम नहीं बनाया हमको गुलाम ब्राह्मणों  ने बनाया है ।
अंग्रेजों कि गुलामी केवल राजनितिक थी ।
परन्तु ब्राह्मणों कि गुलामी
सामाजिक
राजनितिक
शैक्षणिक
आर्थिक एंव
शोषण व अमानवीय अत्याचार से भरी पडी है ।

इसलिए अग्रेजो से आजादी का आंदोलन , ब्राह्मणो का हो सकता है , हम मूलनिवासियों  का नहीं , क्योंकि  अंग्रेजों के   भारत में आने से पहले से ही हम गुलाम थे ।

ज्योतिराव फुले ने कहा था कि अंग्रेज  भारत में है तब तक हमें अवसर है , अपनी आजादी हासिल करने का अग्रेज भारत से चल चले जायेंगें ओर ब्राह्मण भारत का शासक  बन गया तो तुम्हारे पास जो अवसर है , वह भी नही रहेगा


इसलिए बाबा साहब नें कहा था गुलाम भारत में जिसकी बातें भी सहन नहीं होती है
आजाद भारत में उनकी लातें खानी पडेगी ।

इसलिए साथियों 15 अगस्त मूलनिवासियों  की आजादी का दिन नही है , भारत के मुलनीवासी आज भी गुलाम ही है ।
अगर आजादी का आन्दोलन हमारा आन्दोलन था
तो सारी समस्याएँ हमारे समाज कि ही  क्यों हैं
सारे अत्याचार शोषण जो आजादी से पहले थे
वो जस के तस क्यों हैं
3.5% ब्राह्मणों के 367 सांसद क्यों हें
3.5% ब्राह्मणों के ही लगभग 90% केबीनेट मंञी क्यों हैं
3.5% ब्राह्मणों के ही
देश में हाईकोर्ट और सुप्रिम कोर्ट में कुल जजों में से 98% क्यों है
3.5% ब्राह्मणों के ही देश में 79% IAS क्यों है
100% मिडिया ब्राह्मण बानियों का है
परन्तु हमारे पञकार
टिवी एंकर कितने हैं बाबा साहब का सबसे अधिक विरोध कांग्रेस नें किया था ।क्यों किया था
क्या बाबा साहब
इतने विद्वान थे वो आजादी के आन्दोलन में शामिल नहीं थे तो वो किसकी लड़ाई लड रहे थे
बाबा साहब नें क्यों कहा था मेरा अधुरा आन्दोलन  पुरा करो
तो हमें कौनसा आन्दोलन बता कर गयें हैं
जब हम आजाद हो गये थे तो बाबा साहब क्यों कह कर गये थे
विचार करो
बाबा साहब
शिक्षा के बाद
ऐसा क्यों कहा संगठित हो
क्यों संगठित हो
किसके खिलाफ संगठित हो
फिर कहा संघर्ष करो
जब हम आजाद हैं
तो किसके खिलाफ संगठित हो और किससे संघर्ष करो
जागो
🙏🌷जय मूलनिवासी

शुभ प्रभात

जय मूलनिवासी साथियो शुभ प्रभात।

मूलनिवासी

मूलनिवासी भारत ब्लॉग पर आये हुए सभी मूलनिवासी साथियो का मै धन्यवाद करता हु। और आज बहुत दिनों के बाद मेरी इंटरनेट पर पेज बनाने की इच्छा पूरी हुई है। अतः आज मै बहुत अधिक नहीं लिख रहा हु लेकिन वादा है की में निरंतर मूलनिवासी समाज की जागरूकता के विषय पर लिखता रहूँगा जिससे की मूलनिवासी समाज में नई क्रांति का संचार होगा।

धन्यवाद

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